Thursday, 16 April 2026

‘इंतज़ारशास्त्र’ चैप्टर-12 : अशोक गहलोत का कांस्टीट्यूशन क्लब पर हमला, बदहाली और पारदर्शिता पर उठाए सवाल


‘इंतज़ारशास्त्र’ चैप्टर-12 : अशोक गहलोत का कांस्टीट्यूशन क्लब पर हमला, बदहाली और पारदर्शिता पर उठाए सवाल

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जयपुर। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी चर्चित सीरीज ‘इंतज़ारशास्त्र’ के चैप्टर-12 में जयपुर स्थित ड्रीम प्रोजेक्ट ‘कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ राजस्थान’ को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। गहलोत ने आरोप लगाया कि यह विश्वस्तरीय क्लब, जिसे दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया की तर्ज पर बनाया गया था, आज ‘बदला लेने की राजनीति’ का शिकार हो गया है और अपनी संभावनाओं के बावजूद उपेक्षा झेल रहा है।

गहलोत ने कहा कि यह क्लब केवल एक भवन नहीं, बल्कि राजस्थान के बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों के लिए एक साझा लोकतांत्रिक मंच के रूप में तैयार किया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होने के बावजूद इसे लंबे समय तक बंद क्यों रखा गया और अब खोले जाने के बाद भी सदस्यता प्रक्रिया को पारदर्शी और सार्वजनिक क्यों नहीं बनाया जा रहा।

पूर्व मुख्यमंत्री ने क्लब की सुविधाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि इसमें आधुनिक ऑडिटोरियम, मीटिंग हॉल, कॉफी शॉप, लग्जरी जिम, रेस्टोरेंट और वीआईपी गेस्ट रूम जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जो इसे किसी फाइव स्टार सुविधा के बराबर बनाती हैं। इसके बावजूद, इसका उपयोग नगण्य बताया जा रहा है, जो सरकारी संसाधनों के सही उपयोग पर सवाल खड़े करता है।

गहलोत ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा सरकार इस मंच को सक्रिय करने से इसलिए बच रही है क्योंकि यहां होने वाले खुले और लोकतांत्रिक संवाद से सरकार की नीतियों और कमियों पर चर्चा हो सकती है। उन्होंने इसे ‘डर का माहौल’ बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में संवाद के ऐसे मंचों को सीमित करना या निष्क्रिय रखना उचित नहीं है।

उन्होंने क्लब के निर्माण में लगे सार्वजनिक धन का हवाला देते हुए कहा कि यह जनता के खून-पसीने की कमाई से बना है, और इसे केवल इसलिए उपेक्षित रखना कि यह पिछली कांग्रेस सरकार के समय बना था, पूरी तरह अनुचित है। गहलोत ने चेतावनी दी कि यदि सार्वजनिक संपत्तियों के उपयोग में पारदर्शिता नहीं रखी गई और नियमों की अनदेखी जारी रही, तो जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी।

इस मुद्दे ने अब जयपुर के राजनीतिक हलकों के साथ-साथ साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच भी चर्चा छेड़ दी है। कांस्टीट्यूशन क्लब को लेकर उठे ये सवाल प्रदेश की राजनीति में एक नए विवाद का कारण बनते दिख रहे हैं।

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