



नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन में बदलाव की घोषणा करते हुए कहा है कि संघ का कार्य तेजी से विस्तार कर रहा है और समाज की अपेक्षाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में कार्य को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अब विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम उठाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पहले संघ में 46 प्रांत थे, जिन्हें अब बढ़ाकर 86 छोटे-छोटे संभागों में विभाजित किया जाएगा, ताकि स्थानीय स्तर पर कार्य अधिक सुगमता और दक्षता से किया जा सके।
नागपुर में एक मराठी अखबार के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि संगठन के मूल कार्य करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं होगा। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए मित्रता, संवाद और अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करने की परंपरा आगे भी जारी रहेगी।
उन्होंने अपने बयानों को लेकर होने वाली गलत व्याख्याओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस पर हंसी आती है और ऐसे लोगों के प्रति वे सहानुभूति रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बड़े संगठनों में समय-समय पर संरचनात्मक बदलाव सामान्य प्रक्रिया होती है, क्योंकि जैसे-जैसे कार्य और अपेक्षाएं बढ़ती हैं, जिम्मेदारियों का विभाजन भी जरूरी हो जाता है।
भागवत ने यह भी बताया कि जहां शाखाएं नियमित रूप से नहीं लग पातीं, वहां स्वयंसेवक सोसाइटी और बड़ी इमारतों में जाकर लोगों से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आगामी बैठकों में युवाओं को संगठन से जोड़ने के नए तरीकों पर भी विचार किया जाएगा।
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक सशक्त माध्यम बन चुका है और संघ को इसका सकारात्मक उपयोग करना चाहिए। संगठन का कम्युनिकेशन विभाग इस दिशा में सक्रिय है और स्वयंसेवक भी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच बना रहे हैं। संघ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स के साथ भी संवाद कर विभिन्न विषयों पर जानकारी साझा करता है।
इसके अलावा, भागवत ने मुंबई में 8 फरवरी को दिए गए अपने बयान का जिक्र करते हुए कहा कि यदि संघ उनसे पद छोड़ने को कहेगा, तो वे तुरंत ऐसा करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरसंघचालक बनने के लिए जाति कोई मापदंड नहीं है, बल्कि संगठन और समाज के प्रति समर्पण ही सबसे महत्वपूर्ण योग्यता है।