Thursday, 19 March 2026

राजस्थान हाईकोर्ट की एसीबी पर सख्ती: बिना सबूत कार्रवाई पर एफआईआर रद्द, फोन टेपिंग पर भी सवाल


राजस्थान हाईकोर्ट की एसीबी पर सख्ती: बिना सबूत कार्रवाई पर एफआईआर रद्द, फोन टेपिंग पर भी सवाल

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए नगर निगम ग्रेटर के तत्कालीन वित्तीय सलाहकार अचलेश्वर मीणा के खिलाफ दर्ज एफआईआर और समस्त आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। जस्टिस चंद्रप्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि बिना पुख्ता साक्ष्य और वैधानिक प्रक्रिया के की गई कार्रवाई कानून के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना वारंट किसी के घर में प्रवेश कर तलाशी लेना विधि विरुद्ध है। कोर्ट ने यह भी कहा कि एसीबी द्वारा की गई कार्रवाई में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिससे आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

एसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें सूचना मिली थी कि अचलेश्वर मीणा सह आरोपी धनकुमार से ठेकेदारों से एकत्रित राशि लेकर अपने घर पहुंचे हैं। इस आधार पर एसीबी टीम ने उनके घर में प्रवेश कर तलाशी ली, लेकिन वहां से कोई भी रिश्वत की राशि बरामद नहीं हुई। इसके बावजूद एसीबी ने यह दावा किया कि आरोपी ने राशि को खुर्द-बुर्द कर दिया, जिसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुधीर गुप्ता ने अदालत को बताया कि 7 जनवरी 2022 को एसीबी ने बिना वारंट के घर में घुसकर तलाशी ली और गिरफ्तारी की। इसके बाद 8 जनवरी को शाम 5 बजे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर रिमांड लिया गया, जबकि उसी दिन शाम 5:15 बजे एफआईआर दर्ज की गई। इस प्रकार तलाशी और गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया विधि के विपरीत पाई गई।

कोर्ट ने फोन टेपिंग की प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्ति जताई। आदेश में कहा गया कि एसीबी ने फोन टैपिंग की अनुमति लेने में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया। विशेष गृह सचिव द्वारा बिना अधिकार के 60 दिनों की अनुमति दी गई, जिसे बाद में गृह सचिव ने बढ़ा दिया। जबकि भारतीय टेलीग्राफ नियम-1951 के तहत ऐसी अनुमति को 7 दिनों के भीतर समीक्षा समिति के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है, जिसकी अवहेलना की गई।

अदालत ने यह भी कहा कि फोन टेपिंग के लिए यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आरोपी की गतिविधियों से लोक सुरक्षा को किस प्रकार खतरा था और किन आपात परिस्थितियों में यह कदम उठाया गया। कोर्ट ने इसे याचिकाकर्ता के निजता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन माना।

हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल एसीबी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि भविष्य में जांच एजेंसियों को विधिक प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करने का संदेश भी देता है।

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