Sunday, 15 February 2026

राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ का अहम आदेश: पत्नी द्वारा दायर स्थानांतरण प्रार्थना पत्र को किया खारिज


राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ का अहम आदेश: पत्नी द्वारा दायर स्थानांतरण प्रार्थना पत्र को किया खारिज

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जोधपुर। राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ ने पति-पत्नी के तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में संतुलित और उल्लेखनीय निर्णय दिया है। न्यायमूर्ति रेखा बोराणा की एकल पीठ ने जयपुर निवासी 45 वर्षीय पत्नी द्वारा दायर स्थानांतरण प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यद्यपि अनेक मामलों में महिलाएं पीड़ित होती हैं, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि पुरुषों की वास्तविक परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाए। समानता का सिद्धांत दोनों पक्षों की परिस्थितियों को समान रूप से देखने की अपेक्षा करता है।

हाई कोर्ट ने 5 फरवरी को यह आदेश पारित किया। पत्नी ने 21 मई 2025 को सिविल स्थानांतरण आवेदन दायर कर निवेदन किया था कि पति द्वारा बीकानेर के पारिवारिक न्यायालय में दायर तलाक याचिका को जयपुर स्थानांतरित किया जाए। पत्नी का कहना था कि वह वर्ष 2005 से अपने 16 और 18 वर्ष के दो पुत्रों के साथ जयपुर में रह रही है और आजीविका भी यहीं अर्जित करती है। साथ ही दोनों के बीच अन्य वाद भी जयपुर में लंबित हैं, इसलिए तलाक प्रकरण को भी जयपुर स्थानांतरित किया जाना न्यायोचित होगा।

दूसरी ओर पति (49) ने अपने जवाब में बताया कि वह अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र है। उसकी माता कैंसर से पीड़ित होकर बिस्तर पर हैं तथा पिता की आयु 80 वर्ष से अधिक है। उनके उपचार और देखभाल की संपूर्ण जिम्मेदारी उसी पर है, ऐसे में बार-बार जयपुर आना उसके लिए अत्यंत कठिन होगा। सुनवाई के दौरान पति पक्ष के अधिवक्ता उदयशंकर आचार्य ने यह भी निवेदन किया कि यदि पारिवारिक न्यायालय बीकानेर पत्नी के आवागमन व्यय के संबंध में कोई आदेश पारित करता है तो उसका भुगतान पति करने को तैयार है।

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और परिस्थितियों का सम्यक मूल्यांकन करते हुए कहा कि यदि प्रार्थना पत्र स्वीकार किया जाता है तो पति को पत्नी की तुलना में अधिक असुविधा का सामना करना पड़ेगा। इसलिए संतुलन के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए स्थानांतरण आवेदन निरस्त किया जाता है। अधिवक्ता उदयशंकर आचार्य के अनुसार यह निर्णय राज्य में अपने प्रकार का पहला है, जिसमें सिविल स्थानांतरण आवेदन में पति की कठिनाइयों को भी समान रूप से महत्व दिया गया है।

यह आदेश न्यायिक संतुलन और समानता के सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है तथा पारिवारिक वादों में दोनों पक्षों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखने का संदेश देता है।

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