Sunday, 31 August 2025

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिप्यंतरण कार्यशाला का समापन: पाण्डुलिपियों में छुपा है भारत का पुरातन ज्ञान


राष्ट्रीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिप्यंतरण कार्यशाला का  समापन: पाण्डुलिपियों में छुपा है भारत का पुरातन ज्ञान

अगरतला। संस्कृत ग्रंथों और पाण्डुलिपियों में भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का अनमोल खजाना छिपा है। इतिहास गवाह है कि इन ग्रंथों पर अनेक आक्रमण हुए और अंग्रेज़ भारत से असंख्य पाण्डुलिपियाँ अपने साथ ले गए। इन्हीं में से सर विलियम जॉन्स ने 1789 में अभिज्ञान शाकुन्तलम् का अंग्रेज़ी अनुवाद किया था। उसी समय से भारत में भी पुरातन पाण्डुलिपियों के लिप्यंतरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। यह विचार प्रो. वसंत कुमार भट्ट, पाण्डुलिपि विद्या के विद्वान, ने राष्ट्रीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिप्यंतरण कार्यशाला के समापन समारोह में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जर्मन विद्वानों ने संस्कृत को “प्रक्षेप प्रक्षेप” कहकर बदनाम किया, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत का प्राचीन विज्ञान, साहित्य और दर्शन इन्हीं ग्रंथों में निहित है। अब पाठ यात्रा और पाठांतर अध्ययन की आवश्यकता है ताकि इस ज्ञान को नयी पीढ़ी तक पहुँचाया जा सके।

सरकार का प्रयास और रोजगार के अवसर

भारत सरकार ने पाण्डुलिपियों की खोज और संरक्षण के लिए ज्ञान भारतम् मिशन शुरू किया है। प्रो. भट्ट ने कहा कि संस्कृत भाषा के माध्यम से पाण्डुलिपि विज्ञान और लिप्यंतरण अध्ययन न केवल शोध का महत्वपूर्ण क्षेत्र है बल्कि इसमें अब रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध हो रहे हैं।

कार्यशाला के संयोजक और बौद्ध दर्शन एवं पालि विद्याशाखा प्रमुख डॉ. उत्तम सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए 15 दिवसीय कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रतिभागियों को ब्राह्मी, शारदा, नेवारी, प्राचीन नागरी और चकमा लिपियों का प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही, चार अप्रकाशित ग्रंथों की लगभग 350 पृष्ठों की पाण्डुलिपियों का लिप्यंतरण कराया गया। प्रतिभागियों ने इस अनुभव को अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताया।

सारस्वत अतिथि प्रो. अवधेश कुमार चौबे ने कहा कि पाण्डुलिपियों की खोज कर महत्वपूर्ण पुस्तकों का शीघ्र प्रकाशन होना चाहिए। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के निदेशक प्रो. अनिर्वाण दाश ने आयोजन की सफलता पर सभी को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होंगी। समारोह की अध्यक्षता कर रहे एकलव्य परिसर के निदेशक प्रो. मखलेश कुमार ने आश्वस्त किया कि त्रिपुरा में पाण्डुलिपि विद्या के अध्ययन और शोध में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी।

सांस्कृतिक गरिमा के साथ समापन

समारोह की शुरुआत माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और आराधना से हुई। शोधार्थी दीपाली और प्रियंका ने PPT के माध्यम से कार्यशाला की 15 दिनों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। स्वस्तिवाचन आचार्य अजय नागर और शरद चंद्र ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नागपति हेगड़े ने किया, जबकि तकनीकी सहयोग प्रो. चन्दन होता ने प्रदान किया।

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