



जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनाव में पार्षद प्रत्याशियों के टिकट को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में आखिरी दौर तक खींचतान जारी रही। प्रत्याशियों की आधिकारिक सूची जारी होने से पहले रविवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय और कांग्रेस दफ्तर में दिनभर राजनीतिक हलचल बनी रही। कई वार्डों में नेताओं के बीच नामों पर सहमति नहीं बनने के कारण दावेदारों की बेचैनी बढ़ती गई। स्थिति ऐसी रही कि कुछ संभावित प्रत्याशी औपचारिक सूची का इंतजार करने के बजाय पार्टी स्तर से मिले संकेतों के आधार पर सीधे नामांकन की तैयारी में जुट गए।
सुबह से देर रात तक दोनों दलों के दावेदार पार्टी नेताओं के संपर्क में रहे। कार्यालयों के बाहर समर्थकों और टिकट चाहने वालों की भीड़ रही, जबकि भीतर वार्डवार प्रत्याशियों के नाम, सामाजिक समीकरण और स्थानीय नेताओं की पसंद को लेकर बैठकों का दौर चलता रहा।
भाजपा में कई विधानसभा क्षेत्रों में विधायक, पूर्व विधायक और पिछले विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों की पसंद अलग-अलग होने के कारण अंतिम निर्णय मुश्किल हो गया। कुछ नेताओं ने टिकट के लिए केवल एक नाम की सिफारिश की तो संगठन की ओर से तीन नामों का पैनल देने को कहा गया।

किशनपोल विधानसभा क्षेत्र में टिकट वितरण को लेकर पूर्व विधायक मोहनलाल गुप्ता और विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रहे चंद्र मनोहर बटवाड़ा की ओर से सुझाए गए नामों में अंतर सामने आया। कई वार्डों में दोनों नेताओं की पसंद अलग-अलग होने के कारण प्रत्याशी चयन पर सहमति नहीं बन सकी। इसके चलते अंतिम निर्णय पार्टी के उच्च स्तर पर छोड़ना पड़ा। टिकट के दावेदार भी दिनभर अपने-अपने नेताओं के संपर्क में रहकर स्थिति की जानकारी लेते रहे।
सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र में भी टिकटों का गणित उलझा रहा। पूर्व विधायक अरुण चतुर्वेदी और वर्तमान विधायक गोपाल शर्मा की ओर से कई वार्डों में अलग-अलग संभावित प्रत्याशियों के नाम आगे बढ़ाए गए। दोनों पक्षों की पसंद में अंतर होने के कारण कई टिकटों पर अंतिम सहमति बनाने में समय लगा। इससे संबंधित वार्डों के दावेदार देर शाम तक पार्टी के फैसले का इंतजार करते रहे।
आदर्श नगर विधानसभा क्षेत्र में टिकट विवाद महापौर की भविष्य की राजनीति से भी जुड़ता नजर आया। यहां संभावित मेयर पद के दावेदार माने जा रहे एक नाम को लेकर पूर्व विधायक अशोक परनामी और विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रहे रवि नैयर के बीच मतभेद की चर्चा रही। बताया गया कि मामले में सामंजस्य बनाने के लिए दो बार बैठक तक करनी पड़ी। इसके बावजूद कई वार्डों में नाम तय करने के लिए पार्टी नेतृत्व को मशक्कत करनी पड़ी।
बगरू विधानसभा क्षेत्र में संभावित प्रत्याशियों को लेकर विवाद प्रदेश नेतृत्व और मुख्यमंत्री स्तर तक पहुंचने की चर्चा रही। विधायक कैलाश वर्मा की ओर से सुझाए गए कुछ संभावित प्रत्याशियों को लेकर आपत्तियां सामने आईं। कई वार्डों के लिए तीन-तीन नामों का पैनल भेजे जाने की बात सामने आई, लेकिन उनमें से किसी एक नाम पर तत्काल सहमति नहीं बन सकी। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी रही कि औपचारिक बैठक से पहले कुछ दावेदारों को फोन कर टिकट मिलने का संकेत दिया गया था।
रविवार के पूरे घटनाक्रम से साफ रहा कि जयपुर नगर निगम में टिकट केवल स्थानीय लोकप्रियता के आधार पर तय नहीं किए जा रहे। प्रत्याशी चयन में स्थानीय नेताओं की पसंद के साथ संगठन का फीडबैक, जातीय-सामाजिक समीकरण, वार्ड की राजनीतिक स्थिति और भविष्य की महापौर राजनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी कारण एक तरफ पार्टी कार्यालयों में लगातार बैठकों का दौर चला, तो दूसरी तरफ टिकट का इंतजार कर रहे दावेदारों की बेचैनी भी बढ़ती गई।
जयपुर नगर निगम के प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप देने के लिए भाजपा की कोर कमेटी देर रात प्रदेश कार्यालय पहुंची। करीब 12:30 बजे के बाद वरिष्ठ नेताओं के बीच जयपुर के वार्डवार संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चा शुरू हुई। बैठक में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, जिलाध्यक्ष अमित गोयल, सांसद मंजू शर्मा, जयपुर ग्रामीण सांसद राव राजेंद्र सिंह, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी, विधायक कालीचरण सराफ और कैलाश वर्मा सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
बैठक में प्रत्येक वार्ड से सामने आए नामों पर चर्चा की गई और जिन सीटों पर स्थानीय नेताओं के बीच सहमति नहीं थी, वहां अंतिम नाम तय करने के लिए राजनीतिक तथा संगठनात्मक समीकरणों का आकलन किया गया। देर रात तक संभावित प्रत्याशियों की अंतिम सूची पर मंथन जारी रहा।
भाजपा की तरह कांग्रेस में भी जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों के लिए प्रत्याशी चयन को लेकर अंदरूनी खींचतान बनी रही। पार्टी प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय वोट बैंक और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट वितरण की रणनीति पर काम कर रही है। प्रत्याशियों के चयन में मुस्लिम, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के साथ ब्राह्मण, राजपूत, जाट, वैश्य तथा अन्य प्रभावशाली सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखा जा रहा है।कांग्रेस के सामने चुनौती केवल जिताऊ प्रत्याशी चुनने की नहीं, बल्कि एक ही वार्ड में टिकट मांग रहे कई मजबूत दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की भी है।
पार्टी में इस बात को लेकर भी चिंता है कि जिन मजबूत दावेदारों को टिकट नहीं मिलेगा, उनमें से कुछ निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या अधिकृत प्रत्याशी का विरोध कर सकते हैं। कई नेताओं ने टिकट वितरण की जिम्मेदारी प्रदेश नेतृत्व और स्थानीय विधायकों पर छोड़ रखी है। ऐसे में टिकट घोषित होने के बाद नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को संभालना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।यानी कांग्रेस में टिकट की लड़ाई केवल अलग-अलग दावेदारों के बीच नहीं है। जातीय संतुलन, विधायकों की पसंद, स्थानीय नेताओं का प्रभाव और संगठन की चुनावी रणनीति भी प्रत्याशी चयन को प्रभावित कर रही है।
कांग्रेस में वार्ड 47 को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी। यहां सामान्य श्रेणी की सीट पर एसटी वर्ग के एक दावेदार का नाम चर्चा में आने के बाद अन्य दावेदारों ने संगठन के सामने आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद संबंधित नाम को फिलहाल होल्ड कर अन्य संभावित प्रत्याशियों पर चर्चा शुरू की गई। देर रात तक वार्ड 47 के प्रत्याशी की औपचारिक घोषणा नहीं की गई थी।
भाजपा और कांग्रेस दोनों के भीतर चल रही इस खींचतान के बीच अब नजर आधिकारिक प्रत्याशी सूची और नामांकन पर है। जिन वार्डों में स्थानीय नेताओं के बीच सहमति बन चुकी है, वहां प्रत्याशियों को अंदरखाने संकेत मिलने शुरू हो गए हैं, जबकि विवादित वार्डों में अंतिम निर्णय प्रदेश नेतृत्व के स्तर पर किया जा रहा है।
पार्टी की सूची जारी होने के बाद यह भी साफ होगा कि टिकट से वंचित दावेदार संगठन के फैसले को स्वीकार करते हैं या निर्दलीय मैदान में उतरकर अधिकृत प्रत्याशियों के लिए नई चुनौती खड़ी करते हैं।