



जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया निर्णायक दौर में पहुंच गई है। 29 अगस्त को जयपुर और भरतपुर से जुड़े टिकटों पर होने वाले मंथन को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जयपुर उनकी राजनीतिक कर्मस्थली है, जबकि भरतपुर उनका गृह क्षेत्र होने के कारण दोनों जगह टिकट चयन पर राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
भाजपा मुख्यालय में वार्डवार फीडबैक, स्थानीय संगठन की राय और संभावित प्रत्याशियों की जीत की क्षमता को लेकर लगातार बैठकें चल रही हैं। पार्टी पहले ही साफ कर चुकी है कि टिकट वितरण में मेरिट, साफ छवि, संगठनात्मक सक्रियता और जीतने की क्षमता को आधार बनाया जाएगा और व्यक्तिगत सिफारिश को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
इसके बावजूद जयपुर के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में टिकट के दावेदारों के बीच अपने-अपने समर्थकों को पैनल में जगह दिलाने की होड़ ने चयन प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा स्वयं सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। ऐसे में यहां के वार्डों में प्रत्याशी चयन को लेकर उनकी भूमिका और संगठन की राय दोनों महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
स्थानीय राजनीतिक हलकों में मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों की टिकट चयन में संभावित भूमिका को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और भाजपा ने सार्वजनिक रूप से प्रत्याशी चयन को संगठनात्मक प्रक्रिया तथा मेरिट से जोड़कर ही पेश किया है। पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि टिकटों को लेकर ऐसा संदेश न जाए जिससे लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो।
सांगानेर सहित जयपुर के कई क्षेत्रों में पुराने और अनुभवी कार्यकर्ता टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में यदि किसी वार्ड में स्थानीय संगठन की पसंद और प्रभावशाली नेताओं की पसंद अलग-अलग होती है तो बगावत की स्थिति पैदा हो सकती है।
नगर निकाय चुनाव में वार्ड स्तर पर प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ महत्वपूर्ण होती है। इसलिए टिकट से वंचित मजबूत दावेदार यदि निर्दलीय मैदान में उतरते हैं तो पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। भाजपा नेतृत्व इसी कारण वार्डवार विस्तृत फीडबैक लेने के बाद ही अंतिम नाम तय करने की रणनीति अपना रहा है।
जयपुर में केवल सांगानेर ही नहीं, अन्य विधानसभा क्षेत्रों के टिकटों पर भी दिलचस्प मुकाबला है। उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी, मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़, सांसद मंजू शर्मा, मालवीय नगर से विधायक कालीचरण सराफ,हवामहल विधायक बालमुकुंद आचार्य,बगरू से विधायक कैलाश वर्मा और सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने दावेदारी की है। स्वाभाविक रूप से स्थानीय विधायक और संगठन पदाधिकारी अपने क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण तथा दावेदारों को लेकर नेतृत्व के सामने फीडबैक रखेंगे। अंतिम फैसला करते समय पार्टी को स्थानीय विधायक की राय, संगठन के पैनल और प्रत्याशी की जीत की संभावना के बीच संतुलन बनाना होगा।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का भरतपुर से पुराना राजनीतिक और सामाजिक जुड़ाव रहा है। इसी कारण भरतपुर नगर निगम में भाजपा प्रत्याशियों के चयन और पार्टी के प्रदर्शन को भी उनके लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा की कोशिश होगी कि ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतारे जाएं जो स्थानीय स्तर पर मजबूत हों और नगर निगम में पार्टी को बहुमत तक पहुंचाने की क्षमता रखते हों। भरतपुर के स्थानीय राजनीतिक समीकरण जयपुर से अलग हैं, इसलिए यहां प्रत्याशी चयन में स्थानीय जातीय, सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन भी अहम रहने वाला है।
भरतपुर की राजनीति में राष्ट्रीय लोकदल के विधायक डॉ. सुभाष गर्ग भी महत्वपूर्ण चेहरा हैं। निकाय चुनाव को लेकर उनके राजनीतिक रुख पर भी स्थानीय स्तर पर नजर रखी जा रही है।
हालांकि मुख्यमंत्री समर्थक प्रत्याशियों को लेकर उनकी संभावित भूमिका या किसी अन्य राजनीतिक घटनाक्रम से उसे जोड़ने संबंधी बातें फिलहाल राजनीतिक अटकलों के स्तर पर हैं। इनके संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
भाजपा में इस बार प्रत्याशी चयन को लेकर लंबे दौर की बैठकें हो रही हैं। अलग-अलग संभागों के प्रत्येक निकाय और वार्ड के संभावित प्रत्याशियों पर फीडबैक लिया जा रहा है।
पार्टी के भीतर यह रणनीति भी चर्चा में है कि प्रत्याशियों के नाम अंतिम समय तक सीमित दायरे में रखे जाएं, ताकि टिकट नहीं मिलने वाले दावेदारों को बगावत के लिए ज्यादा समय न मिल सके। इसी कारण रविवार देर रात तक कई सीटों पर स्थिति स्पष्ट होने की संभावना जताई जा रही है।
टिकट चयन की संवेदनशील प्रक्रिया को देखते हुए भाजपा प्रदेश मुख्यालय में भी सामान्य दिनों के मुकाबले सख्ती दिखाई दे रही है। बैठकों से जुड़े पदाधिकारियों और नेताओं की आवाजाही को प्राथमिकता दी जा रही है और प्रत्याशी चयन की चर्चा को सीमित दायरे में रखने का प्रयास किया जा रहा है। इससे साफ है कि पार्टी इस बार टिकटों को लेकर संभावित विवाद और अंदरूनी नाराजगी को कम से कम रखना चाहती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतिम टिकट चयन में जमीनी कार्यकर्ता, स्थानीय विधायक की राय और राजनीतिक जीत का समीकरण—इन तीनों में पार्टी किस तरह संतुलन बनाती है।
भाजपा नेतृत्व पहले ही भाई-भतीजावाद और सिफारिश से दूर रहकर जिताऊ और साफ छवि के उम्मीदवारों को टिकट देने की बात कह चुका है। ऐसे में जयपुर और भरतपुर की सूची पार्टी के इस दावे की भी परीक्षा मानी जाएगी। टिकटों की तस्वीर साफ होने के बाद ही पता चलेगा कि पार्टी असंतुष्ट दावेदारों को साधने में कितनी सफल रहती है और कितने वार्डों में बगावत चुनावी समीकरण बदलती है।