



जयपुर मेट्रो फेज-2 के निर्माण: एयरपोर्ट टर्मिनल-2 से खासाकोठी तक 11.72 किमी का हिस्सा सबसे चुनौतीपूर्ण, निर्माण से पहले अलग ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान की जरूरत
जयपुर। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने वाला जयपुर मेट्रो फेज-2 शहर के लिए बड़ी सौगात माना जा रहा है, लेकिन इसका निर्माण शुरू होते ही सबसे बड़ी चुनौती ट्रैफिक मैनेजमेंट की होगी। प्रहलादपुरा से टोडी मोड़ तक प्रस्तावित कॉरिडोर का बड़ा हिस्सा ऐसे मार्गों से होकर गुजरेगा, जहां पहले से ही दिनभर भारी यातायात रहता है।
फिलहाल विभिन्न स्थानों पर मेट्रो पिलर के लिए जियो-टेक्निकल टेस्टिंग की जा रही है। इस शुरुआती काम के दौरान ही टोंक रोड पर कई जगह वाहनों की रफ्तार प्रभावित होने लगी है। जब पिलर, स्टेशन, फाउंडेशन और अन्य निर्माण कार्य शुरू होंगे तो सड़क की उपलब्ध चौड़ाई और कम हो सकती है। टोंक रोड पर प्रतिदिन करीब 1.15 लाख वाहनों की आवाजाही बताई जा रही है। ऐसे में निर्माण कार्य के दौरान यदि ट्रैफिक का वैज्ञानिक और चरणबद्ध प्रबंधन नहीं किया गया तो जाम की समस्या बढ़ सकती है।
मेट्रो फेज-2 का तीसरा पैकेज निर्माण एजेंसियों के लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। एयरपोर्ट टर्मिनल-2 से खासाकोठी तक करीब 11.72 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर में 12 स्टेशन बनाए जाने प्रस्तावित हैं। यह हिस्सा टोंक रोड, दुर्गापुरा, गोपालपुरा बाईपास, टोंक फाटक, गांधी सर्किल, रामनिवास बाग, एसएमएस अस्पताल, महारानी कॉलेज, अहिंसा सर्किल और गवर्नमेंट हॉस्टल होते हुए खासाकोठी तक पहुंचेगा। इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में पहले से ही वाहनों का भारी दबाव रहता है। कई स्थानों पर सड़क की चौड़ाई भी सीमित है, जिससे निर्माण के दौरान ट्रैफिक संचालन और कठिन हो सकता है।
मेट्रो पिलर और स्टेशन निर्माण के लिए सड़क के हिस्से को बैरिकेड करना होगा। खुदाई, मशीनरी और निर्माण सामग्री के कारण कई स्थानों पर वाहनों के लिए उपलब्ध लेन कम हो जाएंगी। ऐसे में निर्माण एजेंसियों के सामने चुनौती होगी कि काम भी चलता रहे और सड़क पर दोतरफा यातायात भी पूरी तरह बाधित न हो।
मेट्रो निर्माण शुरू होने से पहले टोंक रोड और इससे जुड़े प्रमुख चौराहों के लिए विस्तृत ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान तैयार करना महत्वपूर्ण होगा। पिलर निर्माण वाले हिस्सों में बैरिकेडिंग को न्यूनतम चौड़ाई तक सीमित रखते हुए यातायात के लिए पर्याप्त जगह बनाए रखने की जरूरत होगी।
हर निर्माण चरण में कम से कम दोतरफा यातायात चालू रखने का प्रयास किया जा सकता है। इसके साथ ही भारी मशीनरी की आवाजाही, खुदाई, मिट्टी हटाने और निर्माण सामग्री पहुंचाने जैसे काम मुख्य रूप से रात के समय कराए जाने से दिन के यातायात पर दबाव कम किया जा सकता है।
रामबाग, टोंक फाटक, गांधी सर्किल, एसएमएस अस्पताल और खासाकोठी जैसे प्रमुख स्थानों पर पहले से ही पीक आवर्स में जाम की स्थिति बनती है। मेट्रो निर्माण के दौरान इन क्षेत्रों में अतिरिक्त ट्रैफिक मार्शल और ट्रैफिक पुलिस की तैनाती की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा हर चरण के लिए वैकल्पिक डायवर्जन रूट पहले से तय किए जाने और वाहन चालकों को स्पष्ट साइन बोर्ड के माध्यम से इसकी जानकारी देने की जरूरत होगी।
निर्माण अवधि के दौरान प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक लोड में बदलाव होगा। इसलिए रियल टाइम यातायात के आधार पर सिग्नल टाइमिंग में बदलाव, वैकल्पिक मार्गों का उपयोग और पीक आवर्स के लिए अलग व्यवस्था प्रभावी साबित हो सकती है।
जयपुर मेट्रो फेज-2 का निर्माण पूरा होने के बाद शहर के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को बड़ी मजबूती मिलने की उम्मीद है, लेकिन निर्माण अवधि में ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना प्रशासन, मेट्रो प्रबंधन और ट्रैफिक पुलिस के लिए बड़ी परीक्षा होगी।