Thursday, 30 July 2026

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने दलबदल विरोधी कानून पर चर्चा के लिए लोकसभा में दिया स्थगन प्रस्ताव


कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने दलबदल विरोधी कानून पर चर्चा के लिए लोकसभा में दिया स्थगन प्रस्ताव

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कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा—अवसरवादी दलबदल पर प्रभावी रोक लगे, लेकिन सांसदों और विधायकों की वैचारिक असहमति भी सुरक्षित रहे

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर देश के दलबदल विरोधी कानून की व्यापक समीक्षा और नए कानूनी ढांचे पर चर्चा कराने की मांग की है। उन्होंने सदन का निर्धारित कामकाज स्थगित कर संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों और उनके व्यावहारिक प्रभाव पर बहस कराने का आग्रह किया।

तिवारी ने कहा कि मौजूदा कानून राजनीतिक अवसरवाद और बड़े पैमाने पर होने वाले दलबदल को प्रभावी ढंग से रोकने में पर्याप्त साबित नहीं हुआ है। इसे इस तरह संशोधित किया जाना चाहिए कि निर्वाचित प्रतिनिधि राजनीतिक लाभ के लिए दल न बदल सकें, लेकिन नीति अथवा सिद्धांत के आधार पर व्यक्त की जाने वाली उनकी ईमानदार असहमति भी समाप्त न हो।

राजनीतिक दलबदल रोकने के लिए नए कानून की मांग

मनीष तिवारी ने कहा कि संसद को इस पर विचार करना चाहिए कि मौजूदा दलबदल विरोधी कानून की जगह अधिक स्पष्ट, संतुलित और प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता है या नहीं। उनका कहना है कि वर्तमान प्रावधानों का इस्तेमाल कई बार निर्वाचित जनादेश के विपरीत राजनीतिक पुनर्गठन के लिए किया गया है।

उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल पार्टी नेतृत्व का अनुशासन लागू करना नहीं होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें सांसदों और विधायकों को प्रत्येक विधेयक अथवा नीतिगत विषय पर अनिवार्य रूप से पार्टी लाइन का पालन करने के लिए बाध्य न किया जाए।

तिवारी इससे पहले एक निजी सदस्य विधेयक के माध्यम से भी प्रस्ताव कर चुके हैं कि पार्टी व्हिप को सरकार के अस्तित्व से जुड़े विश्वास और अविश्वास प्रस्ताव जैसे सीमित मामलों तक रखा जाए। अन्य विधायी विषयों पर सदस्यों को अपनी समझ के अनुसार मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।

विलय वाले प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ चार से संबंधित उस व्यवस्था और उसकी व्याख्या को चुनौती दी गई है, जिसके तहत किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद विलय का दावा करके दलबदल के आधार पर अयोग्यता से बच सकते हैं।

सिब्बल का तर्क है कि राजनीतिक दल का वास्तविक विलय हुए बिना केवल विधायक दल के सदस्यों के दूसरे दल में जाने को विलय मानना दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य को कमजोर करता है। उन्होंने इस व्यवस्था को राजनीतिक दलबदल के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कानूनी रास्ते के रूप में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कानून के क्रियान्वयन पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान दसवीं अनुसूची के कामकाज से जुड़े गंभीर प्रश्नों का उल्लेख किया और केंद्र सरकार से जवाब मांगा। हालांकि अभी अदालत ने विवादित प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।

मनीष तिवारी की संसदीय मांग और कपिल सिब्बल की न्यायिक चुनौती के बाद दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता, पार्टी व्हिप की सीमा और निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को लेकर बहस दोबारा तेज हो गई है।

क्या है दलबदल विरोधी कानून?

दलबदल विरोधी प्रावधान वर्ष 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के माध्यम से दसवीं अनुसूची में जोड़े गए थे। इनके तहत कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ने अथवा पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान करने पर अयोग्य ठहराया जा सकता है।

वर्तमान व्यवस्था में किसी विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय का निर्णय लेते हैं तो उन पर दलबदल के आधार पर अयोग्यता लागू नहीं होती। इसी अपवाद के इस्तेमाल और कानूनी व्याख्या को लेकर विवाद बना हुआ है।

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