



राजस्थानी भाषा के अध्ययन, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा, कुलपतियों को तत्काल कार्रवाई शुरू करने के निर्देश
जयपुर। राजस्थान की मातृभाषा और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उच्च शिक्षा के स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। राज्यपाल एवं राज्य के वित्तपोषित विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे के निर्देश पर प्रदेश के 11 प्रमुख विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
राजभवन सचिवालय ने इस संबंध में संबंधित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र भेजकर अध्ययन केंद्रों की स्थापना के लिए तत्काल आवश्यक कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से राजस्थानी भाषा, साहित्य, लोक परंपराओं, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन एवं शोध को संस्थागत आधार मिलने की उम्मीद है।
राजभवन की ओर से जारी निर्देशों में कहा गया है कि राजस्थानी प्रदेश के बड़े भू-भाग में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान के लोकजीवन, परंपराओं, ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण संवाहक भी है।
विश्वविद्यालयों में स्थापित होने वाले अध्ययन केंद्र राजस्थानी भाषा और उसकी विभिन्न बोलियों से संबंधित अकादमिक गतिविधियों को बढ़ावा देंगे। इन केंद्रों में भाषा एवं साहित्य से जुड़े शोध, पांडुलिपियों और लोक साहित्य का संकलन, दस्तावेजीकरण तथा संरक्षण किया जा सकेगा।
इसके साथ ही राजस्थानी लोककथाओं, लोकगीतों, कहावतों, मौखिक परंपराओं और ऐतिहासिक साहित्य पर अध्ययन के अवसर विकसित होंगे। विश्वविद्यालयों में अध्ययन केंद्र स्थापित होने से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को राजस्थानी भाषा पर व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने के लिए आवश्यक शैक्षणिक मंच उपलब्ध होगा।
राजभवन के पत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसमें मातृभाषा, स्थानीय और भारतीय भाषाओं में शिक्षा एवं अध्ययन को प्राथमिकता दी गई है। उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थानीय और भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम एवं अध्ययन के अवसर बढ़ाना भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रमुख अवधारणाओं में शामिल है।
इसी उद्देश्य के अनुरूप विश्वविद्यालयों को राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से भाषा शिक्षण के साथ शोध, अनुवाद, प्रकाशन और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित किया जा सकेगा।
राजभवन सचिवालय ने संबंधित कुलपतियों से अध्ययन केंद्रों की स्थापना के लिए आवश्यक प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्ययोजना तैयार करने को कहा है। विश्वविद्यालयों को उपलब्ध संसाधनों, विशेषज्ञ शिक्षकों, शोध सुविधाओं और भविष्य के पाठ्यक्रमों का आकलन कर कार्रवाई आगे बढ़ानी होगी।
अध्ययन केंद्रों के संचालन के लिए राजस्थानी भाषा और साहित्य के विद्वानों, लेखकों, लोक कलाकारों तथा शोधकर्ताओं का सहयोग भी लिया जा सकता है। इससे विश्वविद्यालयों और प्रदेश की लोक-सांस्कृतिक संस्थाओं के बीच बेहतर अकादमिक समन्वय स्थापित हो सकेगा।
इस पहल का उद्देश्य राजस्थानी भाषा को केवल साहित्यिक अध्ययन तक सीमित रखना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को प्रदेश की भाषायी और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना भी है। अध्ययन केंद्रों के माध्यम से सेमिनार, व्याख्यान, कार्यशालाएं, शोध परियोजनाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे।
राजस्थानी भाषा के डिजिटल दस्तावेजीकरण, शब्दकोश निर्माण, दुर्लभ साहित्य के प्रकाशन और दूसरी भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद की संभावनाएं भी विकसित होंगी। इससे राजस्थानी साहित्य और संस्कृति को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है।
