



नई दिल्ली। लोकसभा में मंगलवार, 28 जुलाई को दोपहर करीब दो बजे ‘पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा शुरू हुई। कई दिनों से जारी संसदीय गतिरोध के बाद सरकार और विपक्ष इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विस्तृत बहस के लिए सहमत हुए।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शुरुआत में विधेयक पर चर्चा के लिए छह घंटे निर्धारित किए थे। विपक्षी सदस्यों की ओर से अधिक समय की मांग किए जाने पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार आठ घंटे ही नहीं, आवश्यकता पड़ने पर 10 घंटे तक चर्चा कराने के लिए तैयार है। इसके बाद सदन की सहमति से बहस की अवधि बढ़ाकर 10 घंटे कर दी गई।
यह विधेयक सोमवार, 27 जुलाई को केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में पेश किया था। इसके माध्यम से वर्ष 2024 में लागू पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम में संशोधन करने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि बदलावों से पेपर लीक और संगठित परीक्षा धांधली के मामलों में जांच, मुकदमे और सजा की प्रक्रिया अधिक प्रभावी तथा समयबद्ध होगी।
सरकार की ओर से चर्चा की शुरुआत करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पेपर लीक किसी एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं है। सार्वजनिक परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कठोर तथा विशेष कानून की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक का उद्देश्य मौजूदा कानून को अधिक सख्त बनाना और आरोपियों को शीघ्र दंड दिलाना है। सरकार किसी को भी विद्यार्थियों और योग्य अभ्यर्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं देगी।
विधेयक में अनुचित साधनों का प्रयोग करने वाले व्यक्ति के लिए प्रस्तावित सजा को न्यूनतम पांच वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष करने का प्रावधान है। अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख करने का प्रस्ताव है। परीक्षा आयोजित करने वाली दोषी सेवा प्रदाता संस्था पर अधिकतम ₹5 करोड़ जुर्माना लगाया जा सकेगा और उसे आठ वर्ष तक सार्वजनिक परीक्षा आयोजित करने से प्रतिबंधित किया जा सकेगा।
संगठित पेपर लीक या परीक्षा माफिया से जुड़े अपराधों में न्यूनतम सात वर्ष से अधिकतम 10 वर्ष तक कारावास और ₹10 करोड़ तक जुर्माने का प्रस्ताव है। जांच दो महीने में पूरी करने तथा आरोपपत्र दाखिल होने के बाद विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में तीन महीने के भीतर मुकदमा पूरा करने की व्यवस्था भी विधेयक में शामिल है।
कांग्रेस की ओर से चर्चा की शुरुआत गौरव गोगोई ने की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार लाने के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 के कानून को उस समय भी ऐतिहासिक बताया गया था, लेकिन उसके बावजूद पेपर लीक के मामले नहीं रुके और कई आरोपियों को जमानत मिल गई।
गोगोई ने विधेयक को केवल दिखावे का संशोधन बताते हुए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की जवाबदेही, जांच की गुणवत्ता और आरोपियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान कथित लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठाया तथा सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बल प्रयोग के आदेश किसने दिए थे।
उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों का विश्वास बहाल करने के लिए केवल सजा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। परीक्षा कराने वाली संस्थाओं, अधिकारियों और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से तय करनी होगी।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सरकार की परीक्षा नीति और छात्र आंदोलन से निपटने के तरीके की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वादों के स्थान पर केवल घोषणाएं करती है और छात्रों को दी गई राहत जमीन पर दिखाई नहीं दे रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि पेपर लीक का विषय किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों विद्यार्थियों और बेरोजगार युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध दर्ज मामलों, गिरफ्तारियों और परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही से संबंधित मुद्दे उठाए।
बहस के दौरान सरकार ने विधेयक को परीक्षा माफिया के विरुद्ध मजबूत कानूनी हथियार बताया। सरकार का तर्क है कि कठोर सजा, भारी जुर्माना, विशेष जांच दल और फास्ट ट्रैक अदालतों से आरोपियों में भय पैदा होगा तथा मामलों का शीघ्र निस्तारण संभव होगा।
विपक्षी दलों ने पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की आवश्यकता का समर्थन किया, लेकिन सरकार की मंशा और कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि परीक्षा संस्थाओं और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना केवल दंड बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। कांग्रेस ने कहा है कि वह परीक्षा सुधार से जुड़े प्रभावी कदमों का समर्थन करती है।
विधेयक पर लंबी चर्चा के दौरान विभिन्न दलों के सांसद परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक से विद्यार्थियों को होने वाले नुकसान, जांच की समयसीमा, विशेष अदालतों और परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखेंगे। चर्चा पूरी होने के बाद विधेयक को लोकसभा में पारित कराने के लिए मतदान कराया जा सकता है।