



नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में हुए छात्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और पत्रकारों के घायल होने से संबंधित याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत प्रदर्शन का अधिकार संविधान से संरक्षित है तथा केवल आंदोलन होने के आधार पर पुलिस बल या लाठीचार्ज का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन की आड़ में हिंसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिल सकता।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि याचिकाओं में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की आवश्यकता दर्शाते हैं। अदालत ने कहा कि जांच तभी सार्थक होगी, जब प्रदर्शनकारियों या पुलिसकर्मियों में से कानून हाथ में लेने वाले व्यक्तियों की पहचान कर जिम्मेदारी तय की जाए।
सुनवाई की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम उम्र के छात्रों को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते उनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड न हो।
बाद में अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया गया कि हिरासत में लिए गए कई विद्यार्थी 19 या 20 वर्ष की आयु के भी हैं। इसके बाद पीठ ने अपना निर्देश व्यापक करते हुए स्पष्ट किया कि बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सभी हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा किया जाए। कोर्ट ने ऐसे छात्रों के विरुद्ध फिलहाल किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने को भी कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और संबंधित राज्य सरकारों को प्रदर्शन तथा पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। इनमें सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-वॉर्न कैमरों की रिकॉर्डिंग, पुलिस वायरलेस संवाद, पीसीआर लॉग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा एकत्र किया गया प्रदर्शनकारियों का व्यक्तिगत विवरण और डिजिटल डेटा फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जाए। इसका उद्देश्य जांच पूरी होने तक साक्ष्यों की सुरक्षा और प्रदर्शनकारियों की निजता सुनिश्चित करना है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि निर्दोष लोगों पर अत्यधिक बल प्रयोग करने या कानून हाथ में लेने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने कहा कि निष्पक्ष जांच में पुलिस कार्रवाई के साथ पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर हुए कथित हमलों की भी जांच होनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि आंदोलन की शुरुआत छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में हुई थी, जो संविधान द्वारा संरक्षित है। हालांकि, प्रदर्शन में ऐसे बाहरी या असामाजिक तत्वों के प्रवेश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जो हिंसा फैलाकर पूरे आंदोलन को बदनाम कर सकते हैं। इसलिए जांच में यह निर्धारित करना आवश्यक होगा कि हिंसा छात्रों ने की या प्रदर्शन में घुसे अन्य व्यक्तियों ने।
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना छात्रों का अधिकार है। उन्होंने कहा कि यदि पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध गैरकानूनी या अत्यधिक बल प्रयोग किया है तो दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए।
मेहता ने अदालत को बताया कि आंदोलन के दौरान 250 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का यह दावा नहीं है कि छात्रों ने ही पुलिसकर्मियों पर हमला किया। हिंसा के पीछे प्रदर्शन में घुसे असामाजिक या बाहरी तत्व भी हो सकते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में स्वतंत्र जांच कराने के अदालत के सुझाव पर भी सहमति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में हुई हिंसा और कथित पुलिस ज्यादती की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी या उच्चस्तरीय समिति गठित की जा सकती है। यह जांच किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में कराए जाने पर भी विचार किया जा रहा है।
हालांकि, अदालत ने फिलहाल एसआईटी गठित करने का अंतिम आदेश पारित नहीं किया है। केंद्र, दिल्ली और संबंधित राज्यों के जवाब मिलने के बाद जांच की संरचना और निगरानी व्यवस्था पर निर्णय लिया जाएगा।
पीठ ने कहा कि सार्वजनिक प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण से संबंधित पूर्व न्यायिक निर्णयों तथा दिशा-निर्देशों को एक साथ संकलित कर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत और समान राष्ट्रीय प्रोटोकॉल तैयार करने की आवश्यकता है।
अदालत ने कहा कि समय के साथ प्रदर्शन करने और उनसे निपटने के तरीके बदल गए हैं। ऐसे में पुराने दिशा-निर्देशों की समीक्षा कर यह तय किया जाना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू होने पर पुलिस को किस क्रम में कदम उठाने होंगे, कितनी चेतावनी देनी होगी और किन परिस्थितियों में न्यूनतम आवश्यक बल का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
पीठ ने यह भी कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर तैनात पुलिसकर्मियों को पर्याप्त हेलमेट, सुरक्षा उपकरण और दंगा-रोधी साधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। नए दिशा-निर्देश केवल दिल्ली नहीं, बल्कि पूरे देश में समान रूप से लागू किए जाने पर विचार किया जाएगा।
मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को होगी। इस दौरान केंद्र सरकार, दिल्ली और संबंधित राज्य सरकारों के जवाबों पर विचार किया जाएगा तथा स्वतंत्र जांच और देशव्यापी पुलिस प्रोटोकॉल के संबंध में आगे के आदेश पारित किए जा सकते हैं।