



जलदाय विभाग की लैब जांच से स्पष्ट नहीं हुई वजह, राजस्थान विश्वविद्यालय से एल्गी की पहचान, विषाक्तता और नियमित मॉनिटरिंग के उपायों पर मांगी रिपोर्ट
जयपुर। बीसलपुर परियोजना से जयपुर सहित तीन जिलों में सप्लाई हुए पीले पानी का वास्तविक कारण अब भी जलदाय विभाग के लिए पहेली बना हुआ है। विभागीय प्रयोगशाला में पानी के नमूनों की जांच कराई गई, लेकिन पानी के रंग में बदलाव की निर्णायक वजह सामने नहीं आ सकी। प्रारंभिक विभागीय आकलन में एल्गी यानी काई को पीलापन आने का संभावित कारण माना गया है।
पूर्व में जलदाय विभाग ने पानी में मौजूद ‘क्लोरोफाइटा’ नामक शैवाल के विघटन और क्लोरीन के साथ उसकी प्रतिक्रिया को अस्थायी पीलेपन की संभावित वजह बताया था। हालांकि, इस निष्कर्ष से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि बीसलपुर बांध में कौन-सी एल्गी विकसित हुई, उसकी मात्रा कितनी थी और क्या उसमें कोई विषैला या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व मौजूद था।
पीले पानी की समस्या की मूल वजह जानने के लिए जलदाय विभाग ने अब विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। राजस्थान विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग को भेजे गए प्रस्ताव में बीसलपुर बांध के पानी और उसमें मौजूद एल्गी सहित अन्य जैविक गतिविधियों का अध्ययन करने को कहा गया है।
वैज्ञानिकों की टीम बांध और जलशोधन प्रणाली के विभिन्न स्थानों से पानी तथा काई के नमूने लेकर उनकी प्रजाति, मात्रा, मौसमी व्यवहार और संभावित विषाक्त प्रभाव की जांच करेगी। राजस्थान विश्वविद्यालय का वनस्पति विज्ञान विभाग पादप विज्ञान, माइकोलॉजी और संबंधित जैविक क्षेत्रों में अध्ययन एवं अनुसंधान करता है।
जलदाय विभाग अन्य सरकारी वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों से भी अध्ययन कराने की तैयारी कर रहा है, ताकि भविष्य में पानी के रंग, गंध या गुणवत्ता में बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सके।
वैज्ञानिक अध्ययन में मुख्य रूप से बीसलपुर बांध में मौजूद एल्गी की सटीक प्रजाति और प्रकृति की पहचान की जाएगी। यह भी जांचा जाएगा कि पानी में कोई विषैला या हानिकारक शैवाल तो विकसित नहीं हो रहा है।
अध्ययन के दौरान एल्गी की मात्रा और प्रकार की नियमित निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकी प्रणाली विकसित करने, अलग-अलग मौसम में जैविक गतिविधियों के प्रभाव का आकलन करने तथा जलशोधन प्रक्रिया में आवश्यक बदलावों के संबंध में सुझाव मांगे जाएंगे।
विभागीय विवरण के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में यह तीसरा अवसर है जब बीसलपुर परियोजना से गंदे या पीले रंग के पानी की आपूर्ति की शिकायत सामने आई है। लगातार तीसरी बार ऐसी स्थिति बनने से जलशोधन, गुणवत्ता नियंत्रण और अग्रिम चेतावनी प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
जलदाय विभाग के अतिरिक्त मुख्य अभियंता अजय सिंह राठौड़ ने कहा कि भविष्य में पीले पानी की आपूर्ति रोकने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है। पानी में विकसित होने वाली काई के नमूनों का परीक्षण कर उसके प्रकार और व्यवहार की विस्तृत जानकारी जुटाई जाएगी।
बीसलपुर बांध से प्रतिदिन करीब 6,500 लाख लीटर यानी लगभग 650 मिलियन लीटर पानी जयपुर, अजमेर और टोंक जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचाया जाता है। पानी को सूरजपुरा स्थित जलशोधन संयंत्र में उपचारित करने के बाद बालावाला सहित अन्य वितरण केंद्रों पर क्लोरीनेशन की प्रक्रिया से गुजारा जाता है।
बीसलपुर जलापूर्ति व्यवस्था के संचालन, रखरखाव, जल उपचार और बिजली पर सालाना करीब ₹66 करोड़ खर्च होने की जानकारी दी गई है। इसमें संचालन एवं रखरखाव का कार्य संभाल रही एजेंसी को करीब ₹6 करोड़ वार्षिक भुगतान किया जाता है।
इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद बार-बार पीले पानी की आपूर्ति सामने आने से विभाग की निगरानी व्यवस्था और जलशोधन प्रणाली की जवाबदेही पर प्रश्न उठ रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययन पूरा होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि समस्या बांध में होने वाली जैविक गतिविधियों, मौसमी बदलाव, उपचार प्रक्रिया या वितरण प्रणाली के किसी चरण से जुड़ी है।