



जयपुर। राजस्थान में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों को त्वरित कानूनी सहायता देने के लिए पुलिस ने ई-जीरो एफआईआर व्यवस्था का दायरा बढ़ा दिया है। अब किसी व्यक्ति के साथ ₹1 लाख या उससे अधिक की साइबर वित्तीय ठगी होने पर राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल अथवा हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज होते ही स्वतः ई-जीरो एफआईआर दर्ज हो जाएगी।
महानिदेशक पुलिस राजीव कुमार शर्मा ने प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों और पुलिस आयुक्तों को संशोधित व्यवस्था के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए हैं। नई सीमा गुरुवार, 23 जुलाई से पूरे प्रदेश में प्रभावी कर दी गई है। राजस्थान में ई-जीरो एफआईआर की व्यवस्था पहले से लागू थी, लेकिन अब तक इसकी न्यूनतम सीमा ₹5 लाख थी, जिसे घटाकर ₹1 लाख किया गया है।
अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस, साइबर क्राइम वी.के. सिंह ने बताया कि सीमा कम किए जाने से अब अधिक संख्या में साइबर ठगी पीड़ितों को तत्काल कानूनी संरक्षण मिल सकेगा। इससे पुलिस को शिकायत मिलने के तुरंत बाद डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित करने और ठगी की रकम को आगे स्थानांतरित होने से रोकने की कार्रवाई शुरू करने में सहायता मिलेगी।
नई व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी आई4सी के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल, साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 और क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम यानी सीसीटीएनएस को आपस में एकीकृत किया गया है। पात्र शिकायत दर्ज होते ही संबंधित राज्य स्तरीय साइबर पुलिस स्टेशन में ई-जीरो एफआईआर स्वतः पंजीकृत हो जाएगी।
ई-जीरो एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस शिकायतकर्ता के थाने पहुंचने अथवा उसके हस्ताक्षर करने की प्रतीक्षा नहीं करेगी। जांच अधिकारी तत्काल संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज कराने, ठगी की रकम होल्ड कराने और संबंधित वित्तीय संस्थानों से लेन-देन का विवरण प्राप्त करने की कार्रवाई शुरू कर सकेगा।
इसके साथ ही कॉल डिटेल रिकॉर्ड, इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, बैंक खातों की जानकारी, मोबाइल नंबर, डिजिटल वॉलेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी। इसका उद्देश्य ठगी की रकम को विभिन्न खातों में स्थानांतरित होने से रोकना और अपराधियों तक जल्द पहुंचना है।
शिकायतकर्ता को ई-जीरो एफआईआर दर्ज होने के 72 घंटे के भीतर संबंधित पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मुद्रित प्रति पर हस्ताक्षर करने होंगे। निर्धारित अवधि में उपस्थित नहीं होने पर पुलिस की ओर से शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया जाएगा।
हालांकि शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर के अभाव में प्रारंभिक जांच, बैंक खाते फ्रीज कराने और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करने जैसी जरूरी कार्रवाई नहीं रोकी जाएगी। इससे शिकायतकर्ता के थाने पहुंचने से पहले ही ठगी की रकम बचाने के प्रयास शुरू किए जा सकेंगे।
ठगी की राशि के आधार पर मामले की जांच करने वाली पुलिस इकाई भी निर्धारित की गई है। ₹1 करोड़ या उससे अधिक की साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों का पंजीकरण और अनुसंधान राज्य स्तरीय साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, जयपुर द्वारा किया जाएगा।
वहीं, ₹1 लाख से ₹1 करोड़ तक की साइबर ठगी के मामलों की जांच संबंधित जिला साइबर पुलिस थाना अथवा स्थानीय पुलिस थाना करेगा। जांच इकाई का निर्धारण संबंधित जिला पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त के निर्देश के अनुसार किया जाएगा।
एडीजी साइबर क्राइम वीके सिंह ने नागरिकों से अपील की कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी का पता चलते ही बिना समय गंवाए हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें अथवा राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।
साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती समय महत्वपूर्ण होता है। शिकायत में देरी होने पर रकम कई बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट अथवा अन्य माध्यमों से आगे स्थानांतरित की जा सकती है, जिससे उसकी बरामदगी कठिन हो जाती है।
डीजीपी राजीव कुमार शर्मा ने कहा कि आई4सी की तर्ज पर राज्य में राजस्थान साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी आर4सी की स्थापना के साथ साइबर अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों को त्वरित राहत देने की व्यवस्था मजबूत की जा रही है।
उन्होंने कहा कि ई-जीरो एफआईआर की सीमा घटाना तकनीक आधारित और पीड़ित-केंद्रित पुलिसिंग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे साइबर अपराध की सूचना मिलने और पुलिस की कानूनी कार्रवाई शुरू होने के बीच लगने वाला समय कम होगा तथा ठगी की रकम बचाने की संभावना बढ़ेगी।