



सहारा कर्मचारियों के दावों को प्राथमिक श्रेणी में रखने का निर्देश, न्यायालय ने शीघ्र निस्तारण के लिए प्रत्येक शुक्रवार सुनवाई के संकेत दिए
नई दिल्ली। सहारा-SEBI मामले में सहारा समूह के कर्मचारियों के लंबित वेतन, भविष्य निधि और अन्य बकाया भुगतान से जुड़े दावों पर सुप्रीम कोर्ट में महत्त्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कर्मचारियों के दावों के सत्यापन तथा भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने के प्रस्ताव पर भी विचार किया गया।
सुनवाई से जुड़े विवरण के अनुसार, न्यायालय के समक्ष सहारा से संबंधित बकायेदारों को छह अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर उनके दावों पर क्रमवार विचार करने का सुझाव रखा गया। इस पर न्यायालय ने सहारा के कर्मचारियों के लंबित बकाया दावों को पहली श्रेणी में रखने का निर्देश दिया।
कर्मचारियों की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने न्यायालय में कहा कि कंपनी द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत सूची में शामिल कर्मचारियों के लंबित बकाये का 12 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान किया जाना चाहिए। कर्मचारियों की ओर से इस प्रस्ताव पर सहमति जताई गई।
यह भी स्पष्ट किया गया कि मजीठिया वेतनमान से संबंधित कर्मचारियों का दावा इस भुगतान प्रक्रिया से अलग रहेगा। मजीठिया वेतनमान के अंतर्गत देय राशि और अन्य संबंधित लाभों के लिए पृथक रूप से दावा प्रस्तुत किया जाएगा।
सहारा समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायालय को बताया कि कंपनी द्वारा प्रस्तुत सूचियों में शामिल करीब 16 हजार और नौ हजार कर्मचारियों को सहारा-SEBI खाते से भुगतान किए जाने पर कंपनी को कोई आपत्ति नहीं है।
हालांकि, कर्मचारियों की वास्तविक पात्रता, देय राशि और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किस प्रक्रिया से किया जाएगा, इस विषय पर न्यायालय को आगे निर्णय लेना है। इसी कारण दावों की जांच के लिए स्वतंत्र समिति गठित करने की संभावना पर विचार किया गया।
सहारा-SEBI खाते में जमा धनराशि मूलतः सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निवेशकों के भुगतान से संबंधित व्यवस्था का हिस्सा है। पूर्व में भी सर्वोच्च न्यायालय इस खाते से पात्र दावेदारों को भुगतान के लिए धनराशि जारी करने के आदेश दे चुका है।
भविष्य निधि संगठन की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने कहा कि कर्मचारियों के बकाया भविष्य निधि अंशदान का भुगतान भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस मांग पर सुनवाई के दौरान अलग-अलग पक्षों ने अपनी दलीलें रखीं।
नाफेड की ओर से पीएफ संबंधी भुगतान के प्रस्ताव का विरोध किया गया। उसकी ओर से कहा गया कि संबंधित धनराशि भारत सरकार से जुड़ी है और स्पष्ट न्यायिक आदेश के बिना उसका उपयोग अन्य भुगतान के लिए नहीं किया जा सकता।
ऐसे में पीएफ बकाया के भुगतान के स्रोत और विधिक प्रक्रिया पर न्यायालय को पृथक रूप से विचार करना पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि कर्मचारियों के दावों की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जा सकती है। यह समिति कर्मचारियों की सूची, नियुक्ति अभिलेख, बकाया वेतन, ब्याज, भविष्य निधि और अन्य सेवा संबंधी दावों का सत्यापन कर न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है।
समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन कर्मचारियों को कितनी राशि का भुगतान किया जाना है और भुगतान के लिए सहारा-SEBI खाते अथवा किसी अन्य उपलब्ध निधि का उपयोग किया जा सकता है या नहीं।
न्यायालय ने मामले के शीघ्र निस्तारण की आवश्यकता पर बल देते हुए इसे नियमित रूप से शुक्रवार से शुक्रवार सूचीबद्ध करने के संकेत दिए हैं। अगली सुनवाई में प्रस्तावित समिति के गठन, उसके कार्यक्षेत्र और भुगतान प्रक्रिया के संबंध में आगे विचार होने की संभावना है।
सुनवाई में रखे गए विवरण के अनुसार, कर्मचारियों के बकाया भुगतान के संबंध में अभी कोई अंतिम वितरण आदेश पारित नहीं हुआ है। भुगतान की प्रक्रिया समिति के गठन, दावों के सत्यापन और सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्देशों के बाद ही स्पष्ट होगी।