



जयपुर। राजस्थान में सरकारी नौकरियों में दिव्यांग आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों और पहले से कार्यरत कर्मचारियों के लिए दिव्यांगता प्रमाण पत्रों की जांच की व्यवस्था बदलने जा रही है। प्रमाण पत्रों में विसंगतियों और कथित फर्जीवाड़े पर रोक लगाने के लिए सरकार ने प्रदेश के सात संभागीय मुख्यालयों के मेडिकल कॉलेजों में विशेष दिव्यांगता सत्यापन बोर्ड गठित करने का निर्णय लिया है।
नई व्यवस्था के तहत सामान्य अस्पताल से जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी में पात्रता का अंतिम निर्धारण नहीं होगा। चयनित अभ्यर्थी की दिव्यांगता और उसका प्रतिशत संभागीय मुख्यालय पर गठित विशेष मेडिकल बोर्ड की जांच के बाद ही मान्य किया जाएगा।
कार्मिक विभाग की शासन सचिव अर्चना सिंह की ओर से यह कदम राजस्थान हाईकोर्ट के अमन बनाम राज्य एवं अन्य मामले में पारित अंतरिम आदेश की पालना में उठाया गया है।
चिकित्सा विभाग की ओर से जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, कोटा, उदयपुर और भरतपुर के मेडिकल कॉलेजों तथा उनसे संबद्ध अस्पतालों में दिव्यांगता सत्यापन बोर्ड गठित किए जाएंगे।
इन बोर्डों में असिस्टेंट प्रोफेसर या उससे उच्च स्तर के विशेषज्ञ चिकित्सकों को शामिल किया जाएगा। जिस प्रकार की दिव्यांगता की जांच की जानी है, उससे संबंधित सभी डॉक्टरों की जांच के दौरान उपस्थिति अनिवार्य होगी।
मेडिकल कॉलेजों को विभिन्न प्रकार की दिव्यांगता का आकलन करने के लिए निर्धारित मानक उपकरणों से सुसज्जित किया जाएगा। ये उपकरण सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग द्वारा तय मानकों के अनुरूप होंगे।
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिव्यांगता प्रतिशत का निर्धारण एक समान, वैज्ञानिक और पारदर्शी प्रक्रिया से हो। इससे अलग-अलग अस्पतालों की जांच रिपोर्ट में आने वाले अंतर को कम किया जा सकेगा।
नई भर्ती परीक्षाओं में आवेदन करने वाले दिव्यांग अभ्यर्थियों के पास वैध यूडीआईडी कार्ड होना अनिवार्य किया जाएगा। राजस्थान लोक सेवा आयोग, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड और अन्य भर्ती एजेंसियों को अपने विज्ञापनों में नई सत्यापन व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख करना होगा।
विज्ञापन में यह बताया जाएगा कि चयनित अभ्यर्थियों की दिव्यांगता की अंतिम जांच केवल संभागीय मुख्यालयों पर गठित मेडिकल बोर्ड करेगा।
किसी अभ्यर्थी के पास पहले से जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र होने पर भी सरकारी नौकरी के लिए उसकी अंतिम पात्रता उसी प्रमाण पत्र से निर्धारित नहीं होगी।
विशेष सत्यापन बोर्ड संबंधित अभ्यर्थी की दोबारा जांच करेगा। बोर्ड की रिपोर्ट और निर्धारित मेडिकल मानकों के आधार पर ही यह तय होगा कि अभ्यर्थी दिव्यांग आरक्षण की संबंधित श्रेणी में पात्र है या नहीं।
राज्य सरकार के जिन दिव्यांग कर्मचारियों या अधिकारियों का पुनः सत्यापन किया जा रहा है, उनके लिए भी स्पष्ट व्यवस्था तय की गई है।
पुरानी जांच और नए सत्यापन में दिव्यांगता प्रतिशत अलग पाए जाने पर कर्मचारी की पात्रता का निर्धारण उसके चयन के समय लागू मेडिकल मानकों के अनुसार किया जाएगा। इसका अर्थ है कि वर्तमान मानकों को सीधे पिछली नियुक्ति पर लागू करने के बजाय चयन के समय लागू नियमों पर विचार किया जाएगा।
सरकार ने प्रारंभिक मेडिकल बोर्ड के निर्णय से असंतुष्ट अभ्यर्थियों और कर्मचारियों के लिए अपील की व्यवस्था भी की है। प्रत्येक संभागीय मुख्यालय के मेडिकल कॉलेज में एक अपीलीय सत्यापन बोर्ड गठित किया जाएगा।
यह बोर्ड एडिशनल प्रिंसिपल या मेडिकल अधीक्षक की अध्यक्षता में काम करेगा। अपीलीय बोर्ड में शामिल डॉक्टर प्रारंभिक सत्यापन बोर्ड के सदस्यों से वरिष्ठ पद के होंगे।
किसी अभ्यर्थी या सेवारत कर्मचारी को प्रारंभिक बोर्ड की जांच, दिव्यांगता की श्रेणी या निर्धारित प्रतिशत पर आपत्ति होने पर वह अपीलीय बोर्ड के समक्ष आवेदन कर सकेगा।
अपीलीय बोर्ड दोबारा मेडिकल परीक्षण और रिकॉर्ड की समीक्षा कर अंतिम निर्णय देगा। इससे अभ्यर्थियों को गलत या असंगत मेडिकल आकलन के खिलाफ संस्थागत उपाय उपलब्ध होगा।
नई व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी भर्तियों में वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दिलाना और गलत प्रमाण पत्रों के आधार पर लाभ लेने के प्रयासों को रोकना है।
विशेषज्ञ बोर्ड, यूडीआईडी कार्ड, मानक उपकरण और अपीलीय व्यवस्था लागू होने के बाद दिव्यांगता सत्यापन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत और जवाबदेह हो जाएगी।