Thursday, 02 July 2026

सरकार के खिलाफ नारे लगाने पर शहर से बाहर नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट


सरकार के खिलाफ नारे लगाने पर शहर से बाहर नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

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जस्टिस माधव जामदार की टिप्पणी—विरोध करना नागरिकों का अधिकार, सिर्फ नारे लगाने पर देश निकाला आदेश क्यों

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने नागरिकों के विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने गुरुवार को कहा कि पुलिस केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को शहर या क्षेत्र से बाहर नहीं कर सकती कि उसने सरकार के फैसलों का विरोध किया है या सरकार के खिलाफ नारे लगाए हैं।

कोर्ट ने कहा कि विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने सरकार या राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ नारे लगाए हैं, तो केवल इसी आधार पर उसके खिलाफ देश निकाला जैसी कार्रवाई क्यों की जाए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते और ऐसे नारों के लिए एक्सटर्नमेंट आदेश जारी करने का आधार क्या है।

मामला सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव सईद अहमद से जुड़ा बताया जा रहा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या सभी नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नागरिक विरोध नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते—यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

कोर्ट ने पेपर लीक जैसे मुद्दों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि ऐसे मामलों में लोग विरोध करेंगे, तो क्या उनके खिलाफ भी केस दर्ज कर दिए जाएंगे। अदालत की टिप्पणी नागरिक अधिकारों, शांतिपूर्ण विरोध और पुलिस प्रशासन की शक्तियों की सीमाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि लोकतंत्र में असहमति, विरोध और सरकार की आलोचना को अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का दायित्व है, लेकिन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।

अदालत ने इस मामले में पुलिस द्वारा जारी किए गए आदेश की वैधता और उसके आधार पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि केवल राजनीतिक नारों या सरकार विरोधी अभिव्यक्ति के आधार पर किसी व्यक्ति की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाने जैसी कठोर कार्रवाई का औचित्य स्पष्ट होना चाहिए।

इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जुड़ा अहम मामला माना जा रहा है। हाईकोर्ट की टिप्पणियां यह रेखांकित करती हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार की नीतियों और फैसलों का विरोध करने का अधिकार प्राप्त है, बशर्ते वह विरोध कानून की सीमाओं के भीतर और शांतिपूर्ण रूप से हो।

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