



राजस्थान सरकार ने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जयपुर द्वितीय के अध्यक्ष ग्यारसी लाल मीणा के खिलाफ बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। उपभोक्ता मामले विभाग ने आदेश जारी कर जांच लंबित रहने तक उनकी न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों पर रोक लगा दी है। अगले आदेश तक वे किसी भी प्रकरण की सुनवाई या आदेश पारित नहीं कर सकेंगे।
विभाग की ओर से 19 जून को जारी आदेश में कहा गया है कि जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच लंबित है। ऐसे में उन्हें न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक कार्यों से दूर रखा जाता है। आदेश के तहत अध्यक्ष के रूप में उनकी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां भी तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी गई हैं।
ग्यारसी लाल मीणा पर कथित रूप से 16.50 लाख रुपए की अवैध उगाही, पद के दुरुपयोग, गंभीर कदाचार और आपराधिक धोखाधड़ी जैसे आरोप लगे हैं। हालांकि ये आरोप अभी जांच के अधीन हैं और जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी। सरकार ने फिलहाल एहतियाती और प्रशासनिक दृष्टि से उनकी शक्तियों पर रोक लगाने का निर्णय लिया है।
ग्यारसी लाल मीणा पूर्व में भी कई आदेशों और मामलों को लेकर चर्चा में रहे हैं। वे फिल्म अभिनेता सलमान खान से जुड़े एक प्रकरण में जमानती वारंट जारी करने के कारण सुर्खियों में आए थे। इसके अलावा उपभोक्ता मामलों में बड़े ब्रांड्स और नामचीन हस्तियों से जुड़े प्रकरणों में उनके आदेशों को लेकर भी चर्चा रही।
उनका सबसे चर्चित प्रकरण अलवर के सिलीसेढ़ बांध क्षेत्र और सरिस्का टाइगर रिजर्व के संवेदनशील बफर जोन में बने एक रिसॉर्ट की सील खुलवाने से जुड़ा बताया जाता है। आरोप है कि इस मामले में उन्होंने यूआईटी अलवर की ओर से की गई सीलिंग कार्रवाई को अवैध घोषित किया था और 13 फरवरी 2026 को स्वयं मौके पर जाकर रिसॉर्ट की सील खुलवाई थी।
बताया जाता है कि इसी प्रकरण सहित कुछ अन्य मामलों को लेकर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों के आधार पर सरकार ने जांच लंबित रहने तक उन्हें न्यायिक कार्यों से अलग रखने का फैसला लिया है। प्रशासनिक दृष्टि से यह निर्णय उपभोक्ता आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार के इस आदेश के बाद अब ग्यारसी लाल मीणा किसी भी मामले की सुनवाई नहीं कर सकेंगे और न ही अध्यक्ष के रूप में आदेश पारित कर पाएंगे। उनकी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां भी निलंबित रहने से आयोग के संचालन से जुड़े अधिकार भी फिलहाल उनके पास नहीं रहेंगे।
इस कार्रवाई को लेकर न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। उपभोक्ता आयोग जैसे अर्द्ध-न्यायिक मंचों की विश्वसनीयता आमजन के भरोसे से जुड़ी होती है। ऐसे में अध्यक्ष स्तर के अधिकारी पर लगे गंभीर आरोपों और सरकार की कार्रवाई को जवाबदेही की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल सरकार ने जांच लंबित रहने तक अध्यक्ष की सभी प्रमुख शक्तियों पर रोक लगाकर स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक या अर्द्ध-न्यायिक पदों पर बैठे अधिकारियों से पारदर्शिता, निष्पक्षता और आचरण की उच्च अपेक्षा की जाती है।