



जयपुर। महिलाओं की गरिमा, सम्मान और निजता की रक्षा को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी पीड़िता की निजी या अश्लील तस्वीरें और वीडियो अदालत में खुले तौर पर दाखिल करना स्वीकार्य नहीं होगा। अदालत ने कहा कि ऐसा करना महिला की गोपनीयता और संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। अब ऐसे दस्तावेज केवल सीलबंद लिफाफे या पासवर्ड-सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक फोल्डर के माध्यम से ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जा सकेंगे।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने यह आदेश अलवर जेल में बंद आरोपी नवीन की याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने नाराजगी जताई कि मामले में पीड़िता की अश्लील तस्वीरें याचिका के साथ खुले रूप में संलग्न की गई थीं। अदालत ने इसे पीड़िता की पहचान, गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब धन खो जाता है तो बहुत कम नुकसान होता है, लेकिन जब सम्मान खो जाता है तो व्यक्ति सब कुछ खो देता है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला की गोपनीयता उसकी सुरक्षा कवच है और उसका सम्मान उसकी आत्मा के समान है। यदि इनमें से किसी एक का भी हनन होता है तो उसका प्रभाव दूसरे पर भी पड़ता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दंपती या व्यक्ति के निजी क्षणों की तस्वीरें या वीडियो रिकॉर्ड करना नैतिक दृष्टि से अनुचित है। यदि ऐसी सामग्री का उपयोग किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने, ब्लैकमेल करने या बदनाम करने के उद्देश्य से किया जाता है तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी राष्ट्र की वास्तविक पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति या कानूनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां महिलाओं के साथ पुलिस थानों, अदालतों और सार्वजनिक मंचों पर कैसा व्यवहार किया जाता है।
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए हैं कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में दाखिल होने वाली याचिकाओं की विशेष जांच की जाए ताकि पीड़िता का नाम, पता, फोटो, सोशल मीडिया विवरण या अन्य पहचान संबंधी जानकारी सार्वजनिक न हो। साथ ही रजिस्ट्रार न्यायिक को निर्देश दिया गया है कि इस विषय को प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि पूरे राज्य के लिए एक समान दिशा-निर्देश जारी किए जा सकें।
इसके अलावा रजिस्ट्रार जनरल को सभी न्यायिक अधिकारियों तक आदेश की प्रति पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), पुलिस महानिदेशक, प्रमुख विधि सचिव तथा अभियोजन विभाग के निदेशक को भी आदेश की प्रतियां भेजने का निर्देश दिया है, ताकि राज्यभर के पुलिस थानों को इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा सकें।