



जयपुर। राजस्थान और हरियाणा के बीच लंबे समय से लंबित यमुना जल समझौते को लेकर बड़ी प्रगति हुई है। दोनों राज्यों ने संयुक्त रूप से तैयार की गई डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) केंद्र सरकार को भेज दी है। अब केंद्र सरकार द्वारा डीपीआर का परीक्षण किया जाएगा, जिसके बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी मिलने पर काम शुरू होगा। इस समझौते से राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र के सीकर, चूरू, झुंझुनूं सहित कई जिलों की करीब 30 वर्षों पुरानी पेयजल समस्या के समाधान की उम्मीद बढ़ गई है।
योजना के तहत हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से चार भूमिगत पाइपलाइनें बिछाई जाएंगी। इनमें से तीन पाइपलाइनें राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र को पेयजल उपलब्ध करवाएंगी। एक लाइन हरियाणा-राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराने के लिए होगी। इसके अलावा हरियाणा के दादरी, भिवानी और हिसार क्षेत्रों को भी पेयजल आपूर्ति की जाएगी। हरियाणा से चूरू तक करीब 265 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी।
जल संसाधन विभाग के अनुसार पहले इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 31 हजार करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन अब संयुक्त डीपीआर के आधार पर अंतिम लागत तय की जाएगी। राज्य सरकार ने बजट वर्ष 2026-27 में इस परियोजना के लिए 32 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
राजस्थान और हरियाणा के बीच 17 फरवरी 2024 को संयुक्त डीपीआर तैयार करने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद दोनों राज्यों की संयुक्त टास्क फोर्स द्वारा नियुक्त सलाहकारों ने परियोजना का अलाइनमेंट तैयार किया, जिस पर हरियाणा सरकार ने लिखित सहमति प्रदान कर दी है।
परियोजना के तहत हथिनीकुंड बैराज से जुलाई से अक्टूबर तक राजस्थान को आवंटित यमुना जल को भूमिगत पाइपलाइन के जरिए चूरू, सीकर, झुंझुनूं और अन्य जिलों तक पहुंचाया जाएगा। इस योजना से लगभग 577 एमसीएम पानी पेयजल और अन्य आवश्यकताओं के लिए उपलब्ध होगा।
इसके अलावा ऊपरी यमुना बेसिन में रेणुकाजी, लखवार और किशाऊ भंडारण परियोजनाओं के निर्माण के बाद राजस्थान को वर्षभर इसी पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इससे प्रदेश के शुष्क क्षेत्रों में स्थायी जल समाधान मिलने की संभावना जताई जा रही है।
यह समझौता पिछले 32 वर्षों से लंबित था। वर्ष 1994 में अपर यमुना रिवर बोर्ड की बैठक में राजस्थान के हिस्से का पानी तय किया गया था। उस समय मानसून अवधि में राजस्थान को 1917 क्यूसेक पानी आवंटित किया गया था। इसके बाद कई बार प्रस्ताव, एमओयू और फिजिबिलिटी रिपोर्ट भेजी गईं, लेकिन विभिन्न कारणों से योजना आगे नहीं बढ़ सकी। वर्ष 2018 में केंद्रीय जल आयोग ने भूमिगत पाइपलाइन आधारित फिजिबिलिटी रिपोर्ट को स्वीकृति दी थी।
अब दोनों राज्यों द्वारा संयुक्त डीपीआर केंद्र सरकार को भेजे जाने के बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जल्द धरातल पर उतरने की उम्मीद बढ़ गई है।