Sunday, 24 May 2026

संस्कृत जगत के महान विद्वान प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री : भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक दूत


संस्कृत जगत के महान विद्वान प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री : भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक दूत

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प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री भारत के अग्रणी संस्कृत विद्वानों, दार्शनिकों और शैक्षणिक प्रशासकों में अग्रणी स्थान रखते हैं। अद्वैत वेदांत, भारतीय दर्शन और संस्कृत काव्यशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अत्यंत सम्मानित माना जाता है। वर्तमान में वे कांचीपुरम स्थित श्री चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती विश्व महाविद्यालय (SCSVMV) के चांसलर के रूप में कार्यरत हैं तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR), नई दिल्ली की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फैलोशिप से भी सम्मानित हैं।

वैदिक परंपरा से आधुनिक अकादमिक उत्कृष्टता तक का सफर

12 अगस्त 1950 को आंध्र प्रदेश के गुडलावलेरु में जन्मे प्रो. शास्त्री ने बाल्यकाल से ही पारंपरिक वैदिक शिक्षा में असाधारण प्रतिभा दिखाई। उन्होंने तिरुमाला स्थित एसवी वेदपाठशाला में ऋग्वेद का गहन अध्ययन किया, जिसने उनके वैदिक और दार्शनिक चिंतन की मजबूत नींव रखी। इसके बाद उन्होंने संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए आंध्र विश्वविद्यालय से विद्याप्रवीण तथा मद्रास विश्वविद्यालय से शिरोमणि जैसी प्राच्य उपाधियां अर्जित कीं।

उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली से विद्यावरिधि (पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की तथा श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए और योग में स्नातकोत्तर डिप्लोमा कर अपनी शैक्षणिक क्षमता को और समृद्ध किया। एस-व्यासा विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और कविकुलगुरु कालिदास विश्वविद्यालय, रामटेक ने उन्हें मानद डी.लिट उपाधियों से सम्मानित किया।

संस्कृत शिक्षा और संस्थागत निर्माण में ऐतिहासिक योगदान

प्रो. शास्त्री ने भारतीय संस्कृत शिक्षा जगत में कई महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाईं। वे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी और श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात के कुलपति रहे। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (अब केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय) के संस्थापक कुलपति के रूप में संस्थागत विकास और पाठ्यक्रम सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उनके नेतृत्व में संस्कृत शिक्षा को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने, शोध को बढ़ावा देने और वैश्विक स्तर पर भारतीय ज्ञान परंपरा की पहचान मजबूत करने के अनेक प्रयास हुए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ संस्कृत स्टडीज के अध्यक्ष के रूप में लगातार दो कार्यकाल पूरे किए और यूरोप, एशिया तथा उत्तरी अमेरिका में आयोजित विश्व संस्कृत सम्मेलनों की अध्यक्षता की।

संस्कृत-स्वाध्याय आंदोलन से लाखों लोगों को जोड़ा

प्रो. शास्त्री केवल एक विद्वान ही नहीं, बल्कि संस्कृत को जनसामान्य तक पहुंचाने वाले प्रेरणादायक शिक्षाशास्त्री भी हैं। उनके नेतृत्व में विकसित “संस्कृत-स्वाध्याय” स्व-शिक्षण सामग्री ने लगभग 20 लाख लोगों को संस्कृत सीखने और बोलने के लिए प्रेरित किया। यह अभिनव कार्यक्रम देशभर के विश्वविद्यालयों और संगठनों द्वारा अपनाया गया और संस्कृत को समाज के विभिन्न वर्गों तक सरल रूप में पहुंचाने में सफल रहा। उन्होंने अब तक 15 से अधिक पुस्तकों और 50 से ज्यादा शोधपत्रों का लेखन एवं संपादन किया है। उनका चर्चित मोनोग्राफ “तात्पर्य: एन इंटर-सास्त्रिक स्टडी” भारतीय दर्शन और व्याख्यानशास्त्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

अनेक राष्ट्रीय सम्मान और वैश्विक प्रतिष्ठा

प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री को भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। इनमें भारत के राष्ट्रपति का सम्मान पत्र (2014), महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार, संस्कृत साहित्य सेवा सम्मान, वेदव्यास पुरस्कार और लोकमान्य तिलक संस्कृत पुरस्कार प्रमुख हैं।

पारंपरिक वैदिक शिक्षा और आधुनिक समालोचनात्मक चिंतन के अद्वितीय समन्वय ने उन्हें शंकराचार्यों, पीठाधीशों, महामंडलेश्वरों और वैश्विक संस्कृत समुदाय के बीच विशेष प्रतिष्ठा दिलाई है। अपनी विद्वता, नेतृत्व और संस्कृत प्रचार-प्रसार के माध्यम से उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने और विश्व मंच पर स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

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