Sunday, 24 May 2026

‘वन दादी’ श्रीमती देवकी अम्मा : जिन्होंने बंजर तटीय भूमि को बना दिया हरा-भरा वन


‘वन दादी’ श्रीमती देवकी अम्मा : जिन्होंने बंजर तटीय भूमि को बना दिया हरा-भरा वन

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केरल के अलाप्पुझा जिले की पर्यावरण संरक्षक और वन उत्पादक श्रीमती देवकी अम्मा जी आज पूरे देश में “वन दादी” के नाम से जानी जाती हैं। उन्होंने अपने अथक परिश्रम, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के प्रति समर्पण के बल पर बंजर तटीय भूमि को एक समृद्ध वन पारिस्थितिकी तंत्र में बदल दिया। पिछले चार दशकों में उन्होंने “कोल्लाकल थपोवनम” नामक पांच एकड़ के गृह वन को विकसित किया, जहां आज 3,000 से अधिक पेड़ और अनेक स्वदेशी, औषधीय तथा दुर्लभ पौधों की प्रजातियां संरक्षित हैं। उनका कार्य जैव विविधता संरक्षण और टिकाऊ पर्यावरणीय पुनरुद्धार का प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है।

एक दुर्घटना ने बदल दी जीवन की दिशा

19 अगस्त 1934 को जन्मी श्रीमती देवकी अम्मा प्रारंभिक जीवन में खेती-किसानी से जुड़ी थीं और धान, तिल, नारियल तथा सब्जियों की खेती किया करती थीं। वर्ष 1980 में एक गंभीर सड़क दुर्घटना में उनके पैर में गंभीर चोट लगी, जिससे उनकी गतिशीलता प्रभावित हुई और उन्हें खेती का कार्य बंद करना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने अपने घर के पास की रेतीली जमीन पर पौधे लगाने शुरू किए। जो शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर की गई थी, वह धीरे-धीरे आजीवन पर्यावरण संरक्षण अभियान में बदल गई।

पारंपरिक ज्ञान से तैयार किया हरित वन

देवकी अम्मा ने पौधरोपण के लिए आधुनिक तकनीकों के बजाय पारंपरिक ज्ञान, मिट्टी और जलवायु की गहरी समझ का सहारा लिया। उन्होंने जैविक खाद, पत्तों की परत (मल्चिंग), जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के माध्यम से तटीय रेतीली मिट्टी को उपजाऊ बनाया। उन्होंने थपोवनम परिसर में दो तालाब भी संरक्षित किए, जिससे सालभर जल उपलब्धता बनी रही और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा मिला।

उनके प्रयासों से न केवल क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु में सुधार हुआ, बल्कि गर्मी की तीव्रता भी कम हुई। आज कोल्लाकल थपोवनम अनेक दुर्लभ और लुप्तप्राय वनस्पतियों का संरक्षण केंद्र बन चुका है। यहां पक्षियों, तितलियों और छोटे जीवों की अनेक प्रजातियां निवास करती हैं, जिसने इसे एक संतुलित प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का रूप दे दिया है।

छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा केंद्र

देवकी अम्मा का यह वन आज विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए अध्ययन और प्रेरणा का केंद्र बन गया है। वे स्कूलों, कॉलेजों और घरों को बीज और पौधे उपलब्ध कराकर लोगों को स्वदेशी एवं औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए प्रेरित करती रही हैं। उनका संदेश हमेशा यही रहा है कि मनुष्य को अपनी ऑक्सीजन और भोजन की जरूरतों के अनुसार पेड़ लगाने चाहिए और प्रकृति की दीर्घकालिक देखभाल करनी चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान

पर्यावरण संरक्षण और तटीय क्षेत्रों में वनीकरण के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए श्रीमती देवकी अम्मा को कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। उन्हें वर्ष 2003 में “इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार” तथा वर्ष 2018 में “नारी शक्ति पुरस्कार” प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें “वनमित्र पुरस्कार”, “भूमित्र पुरस्कार”, “राज्य जैव विविधता पुरस्कार (हरित व्यक्ति)” सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

वर्ष 2019 में “द बेटर इंडिया” ने उन्हें “10 Heroes Saving Us All” सूची में शामिल कर उनके चार दशक लंबे पर्यावरणीय योगदान को राष्ट्रीय पहचान दी।

प्रकृति संरक्षण का जीवंत प्रतीक

श्रीमती देवकी अम्मा आज इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि व्यक्तिगत स्तर पर शुरू किया गया छोटा प्रयास भी समाज और पर्यावरण में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने यह साबित किया कि प्रकृति के प्रति समर्पण, धैर्य और निरंतर प्रयास से बंजर भूमि को भी जीवन से भरपूर हरित संसार में बदला जा सकता है।

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