Thursday, 14 May 2026

दिल्ली आबकारी नीति मामले में हाईकोर्ट सख्त: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा बोलीं- न्यायपालिका की गरिमा पर हमला बर्दाश्त नहीं


दिल्ली आबकारी नीति मामले में हाईकोर्ट सख्त: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा बोलीं- न्यायपालिका की गरिमा पर हमला बर्दाश्त नहीं

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दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथित घोटाले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए न्यायपालिका की गरिमा पर हमला करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। दिल्ली उच्च न्यायालय में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि उनके और अदालत के खिलाफ सोशल मीडिया तथा अन्य माध्यमों पर आपत्तिजनक, मानहानिकारक और द्वेषपूर्ण टिप्पणियां की जा रही हैं, जिन्हें किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि यह केवल किसी एक न्यायाधीश पर व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और विश्वसनीयता पर प्रहार है। उन्होंने कहा कि अदालत ऐसी गतिविधियों पर मौन नहीं रहेगी और दोषियों के खिलाफ अदालत की अवमानना के तहत कानूनी कार्यवाही शुरू की जाएगी।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने बताया कि उनका मूल उद्देश्य गुरुवार को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक के कानूनी पक्ष को रखने के लिए एमिकस क्यूरी अर्थात न्याय मित्रों के नामों की घोषणा करना था। हालांकि, इसी दौरान उनके संज्ञान में ऐसी सामग्री आई, जिसमें अदालत और न्यायाधीश की प्रतिष्ठा पर गंभीर टिप्पणी की गई थी। न्यायमूर्ति ने कहा कि इस विषय पर उनका विस्तृत आदेश तैयार है, जिसे शाम पांच बजे सुनाया जाएगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने कहा कि उन्हें यह जानकारी मिली है कि कुछ लोग उनके और अदालत के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां पोस्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल उनका नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था का अपमान है और इसे सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा की रक्षा करना आवश्यक है।

इससे पहले भी दिल्ली आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने स्वयं को सुनवाई से अलग करने की मांग को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि बिना किसी ठोस आधार के पक्षपात के आरोप लगाना न्यायपालिका की साख पर हमला है। न्यायमूर्ति ने कहा कि यदि अदालत ऐसे आरोपों के दबाव में झुकती है, तो यह भविष्य के लिए गलत परंपरा स्थापित करेगा और न्यायिक संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

दूसरी ओर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अदालत पर अविश्वास जताते हुए कार्यवाही में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उन्होंने पत्र लिखकर कहा कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है और वे महात्मा गांधी के सत्याग्रह के रास्ते पर चलते हुए इस प्रक्रिया का बहिष्कार करेंगे। उनके समर्थन में मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने भी अदालत को सूचित किया कि वे अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील या प्रतिनिधि नहीं भेजेंगे।

इस घटनाक्रम के बाद कानूनी और राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। एक ओर न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता का मुद्दा उठ रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और आम आदमी पार्टी इस मामले को राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रही है। आने वाले दिनों में अदालत की अगली कार्रवाई और संभावित अवमानना कार्यवाही पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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