



जयपुर। राजस्थान भाजपा के प्रभारी डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल एक बार फिर अपने बयानों को लेकर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में हैं। कांग्रेस नेता सचिन पायलट को हाल ही में ‘बहुरूपिया’ कहे जाने के बाद प्रदेश की राजनीति में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब अग्रवाल के बयान ने विवाद खड़ा किया हो। इससे पहले वे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) प्रमुख हनुमान बेनीवाल को ‘चूहा’ कह चुके हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डॉ. अग्रवाल एक अनुभवी और रणनीतिक नेता हैं। पेशे से चिकित्सक और गोरखपुर में मजबूत राजनीतिक पकड़ रखने वाले अग्रवाल यह भली-भांति जानते हैं कि किस बयान पर कैसी प्रतिक्रिया आएगी। यही वजह है कि उनके हालिया बयानों को कई लोग ‘रणनीतिक राजनीतिक शोर’ पैदा करने की कोशिश मान रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डॉ. अग्रवाल ने राजस्थान की सोशल मीडिया और यूट्यूब राजनीति का गहराई से अध्ययन किया है। प्रदेश के कई यूट्यूब चैनलों और राजनीतिक चर्चाओं में सचिन पायलट, हनुमान बेनीवाल, किरोड़ी लाल मीणा और रविंद्र सिंह भाटी जैसे नामों पर सबसे ज्यादा चर्चा और ‘रीच’ मिलती है। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा प्रभारी ने भी उन्हीं चेहरों को निशाने पर लेकर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनने की रणनीति अपनाई है। चूंकि किरोड़ी लाल मीणा भाजपा सरकार में मंत्री हैं और रविंद्र सिंह भाटी को लेकर भविष्य की संभावनाएं मानी जाती हैं, इसलिए हमला विपक्षी चेहरों पर केंद्रित दिख रहा है।
इससे पहले जब डॉ. अग्रवाल ने सचिन पायलट पर टिप्पणी की थी, तब कांग्रेस के युवा नेताओं और NSUI कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए थे। उदयपुर में उन्हें काले झंडे भी दिखाए गए थे। इसके बाद अग्रवाल ने बयान दिया था कि यदि उनके शरीर को कोई हानि होती है तो इसकी जिम्मेदारी सचिन पायलट की होगी। उस समय सचिन पायलट ने भी अपने समर्थकों को शांत रहने की सलाह दी थी और मामला धीरे-धीरे शांत हो गया। इसके बाद एक अन्य दौरे में अग्रवाल ने हनुमान बेनीवाल को ‘चूहा’ कह दिया था। इस पर बेनीवाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “उल्टी-सीधी बातें की तो छोरे जूत धर देंगे।” इसके बाद काफी समय तक भाजपा प्रभारी का राजस्थान दौरा नहीं हुआ और मामला ठंडा पड़ गया।
ताजा घटनाक्रम में, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पहले राजस्थान दौरे के दौरान अग्रवाल ने सचिन पायलट पर हमला बोल दिया। इसका असर यह हुआ कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे से ज्यादा चर्चा प्रदेश प्रभारी के बयान की होने लगी।
इस बार सिर्फ पायलट समर्थक ही नहीं, बल्कि गहलोत गुट भी सचिन पायलट के समर्थन में उतर आया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस मौके का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस विवाद के चलते जयपुर में राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत कार्यक्रम में हुई अव्यवस्थाएं और अन्य मुद्दे गौण हो गए।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह बयानबाजी सिर्फ जुबानी फिसलन है या सुनियोजित रणनीति? राजस्थान की राजनीति में भाषा की मर्यादा को लेकर बहस तेज है। हालांकि यह भी सच है कि प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में कई नेताओं द्वारा भाषा की सीमाएं लांघने के उदाहरण सामने आए हैं। फिलहाल, डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल के बयानों ने राजस्थान की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है—क्या यह रणनीतिक विवाद है या अनावश्यक बयानबाजी? आने वाले दिनों में इसका असर भाजपा और कांग्रेस दोनों की राजनीति पर दिखाई दे सकता है।