



जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए गठित सर्वोच्च संस्था राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (RSCPCR) में लंबे समय से अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली रहने पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था का निष्क्रिय रहना बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मामले में दायर जनहित याचिका की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब मांगा है।
यह सुनवाई जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई, जहां जुवेनाइल जस्टिस एडवोकेट्स एसोसिएशन की ओर से याचिका प्रस्तुत की गई। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले एक वर्ष से अधिक समय से आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के पद रिक्त पड़े हैं, जिसके कारण आयोग की गतिविधियां लगभग ठप हो चुकी हैं। बच्चों के संरक्षण, शिकायतों की सुनवाई और निगरानी जैसे अहम कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आयोग की निष्क्रियता पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में संस्थागत तंत्र का सक्रिय रहना अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक नियुक्तियां नहीं होना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है और यह स्थिति बच्चों के हितों के विपरीत है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 17 फरवरी को आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल ने नोटिस स्वीकार किया। अदालत ने बाल अधिकार विभाग के मंत्री, मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव तथा बाल अधिकार विभाग के आयुक्त से विस्तृत जवाब तलब किया है।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार 23 फरवरी तक इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे और यह स्पष्ट करे कि आयोग में नियुक्तियां क्यों लंबित हैं तथा इन्हें कब तक पूरा किया जाएगा। हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि बच्चों के अधिकारों से जुड़ी संस्थाओं को निष्क्रिय रहने देना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जाएगा।