



जयपुर। 75 वर्ष से अधिक आयु के दंपती की 58 साल पुरानी शादी को समाप्त करने से राजस्थान हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया। जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य अनबन, झगड़े और उतार-चढ़ाव को ‘क्रूरता’ मानकर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि इस उम्र और इतने लंबे वैवाहिक जीवन के बाद तलाक की अनुमति देना न केवल पत्नी बल्कि पूरे परिवार की गरिमा और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है। हाईकोर्ट ने यह आदेश भरतपुर फैमिली कोर्ट के 18 अक्टूबर 2019 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि दंपती का विवाह 29 जून 1967 को हुआ था और वर्ष 2013 तक दोनों ने बिना किसी गंभीर शिकायत के साथ जीवन बिताया। स्वयं पति ने 26 मई 2014 को फैमिली कोर्ट, भरतपुर में दायर तलाक याचिका में यह स्वीकार किया था कि इतने वर्षों तक वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से चला।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी लगभग 46 साल तक बिना किसी शिकायत के साथ रहे हों, तो यह माना जा सकता है कि समय के साथ उनकी सहनशीलता और समझदारी भी बढ़ी होगी। शुरुआती वर्षों में जो बातें परेशान कर सकती हैं, वे परिपक्व आयु में सहनशीलता के कारण उतनी गंभीर नहीं रह जातीं।
पति की ओर से कहा गया कि पत्नी ने 2014 में दहेज प्रताड़ना का झूठा मामला दर्ज कराया, जिस पर पुलिस ने एफआर लगा दी। इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी बड़े बेटे के प्रभाव में है और संपत्ति उसी के नाम करवाना चाहती है, जबकि वह दोनों बेटों में बराबर बंटवारा चाहते हैं। साथ ही पत्नी उन पर अवैध संबंधों के आरोप लगाती है।
पत्नी ने हाईकोर्ट में कहा कि पति पारिवारिक संपत्ति को बांटने और बर्बाद करने की कोशिश कर रहे थे, जिसका उसने विरोध किया। उसने आरोप लगाया कि पति ने एक महिला को अपने कमरे में बुलाया, जिसका विरोध करने पर उसे धक्का देकर बाहर कर दिया । इन परिस्थितियों में उसे एफआईआर दर्ज करानी पड़ी। पत्नी ने यह भी कहा कि जिस संपत्ति की बात हो रही है, वह उसने स्वयं खरीदी थी।
हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस ने पत्नी की एफआईआर पर एफआर लगा दी थी, लेकिन महिला के कमरे में मौजूद होने की घटना को पूरी तरह असत्य नहीं पाया गया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विवाद मुख्य रूप से संपत्ति बंटवारे से जुड़ा है और इसे वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर भरतपुर फैमिली कोर्ट ने तलाक याचिका खारिज की थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।