



राजस्थान में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है जब प्रदेश के सभी पुराने शहरी निकाय पूरी तरह प्रशासनिक नियंत्रण में आ गए हैं। राज्य के 196 पुराने नगरीय निकायों में अब चुने हुए मेयर और सभापति नहीं रहे, बल्कि उनकी जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति कर दी गई है। इन सभी निकायों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और अंतिम चरण में चूरू जिले के बचे हुए निकायों में भी शुक्रवार रात से प्रशासक तैनात कर दिए गए हैं।
नगरीय निकाय चुनाव फिलहाल OBC आयोग की रिपोर्ट के इंतजार में पूरी तरह अटके हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि राज्य में OBC आयोग की रिपोर्ट आए बिना नगरीय निकाय चुनाव नहीं कराए जा सकते। इसी कारण सरकार असमंजस की स्थिति में फंसी हुई है। OBC आयोग अब तक तीन बार रिपोर्ट देने की समय-सीमा बढ़ा चुका है और अब आयोग को 31 मार्च 2026 तक का समय दिया गया है।
जानकारों का मानना है कि OBC आयोग की रिपोर्ट प्रदेश के 309 नगरीय निकायों के चुनाव में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है। रिपोर्ट आने के बाद न सिर्फ चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी, बल्कि सभी निकायों में आरक्षण की लॉटरी भी निकाली जानी है, जिसमें OBC के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण होगा। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, चुनाव कराना संभव नहीं है।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट का यह भी निर्देश है कि 15 अप्रैल तक हर हाल में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कराए जाएं। हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि चुनाव टालने के पीछे उसकी मंशा नहीं है और प्रशासनिक स्तर पर सभी तैयारियां पूरी हैं। केवल OBC आयोग की रिपोर्ट का इंतजार है, जिसके बिना चुनाव कराना संवैधानिक रूप से संभव नहीं है।
प्रदेश में कुल 309 नगरीय निकायों में एक साथ चुनाव प्रस्तावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, जब तक राज्य OBC आयोग सर्वे और परीक्षण के माध्यम से OBC वर्ग की वास्तविक स्थिति और आंकड़े उपलब्ध नहीं कराता, तब तक राजनीतिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसी वजह से पूरी चुनावी प्रक्रिया OBC आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर हो गई है। नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही OBC आयोग की रिपोर्ट प्राप्त होगी, उसके तीन दिन के भीतर आरक्षण की लॉटरी निकाल दी जाएगी। इसके बाद संपूर्ण प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग को सौंप दी जाएगी और वही चुनाव की नई तिथि तय करेगा।