



जयपुर। शहर में अवैध निर्माण करने वाले बिल्डर और निर्माणकर्ता जेडीए की कार्रवाई से बचने के लिए कोर्ट की आड़ ले रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) की प्रवर्तन शाखा से जुड़े सरकारी जमीन और अवैध निर्माण के करीब 10 हजार मामले जेडीए ट्रिब्यूनल में लंबित पड़े हैं। कई मामलों में जेडीए के नोटिस के बाद निर्माणकर्ता अदालत की शरण लेते हैं और महीनों तक सुनवाई खिंचवाने के बाद जब राहत नहीं मिलती, तो वे खुद छह-छह महीने में अवैध निर्माण हटाने का शपथ पत्र पेश कर देते हैं, जबकि जेडीए अपने स्तर पर सात दिन में निर्माण हटाने का नोटिस देता है।
ऐसा ही एक मामला जय जवान कॉलोनी में सामने आया है। यहां भूखंड संख्या 17 और 18 पर किए गए अवैध निर्माण को लेकर जेडीए प्रवर्तन शाखा ने 15 फरवरी 2025 को नोटिस जारी किया था। निर्माणकर्ता ने नोटिस के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और करीब एक साल तक मामले की सुनवाई चलती रही। अंततः निर्माणकर्ता ने अवैध निर्माण स्वीकार करते हुए छह महीने में सेटबैक क्षेत्र का अतिक्रमण हटाने का हलफनामा पेश कर दिया।
जेडीए की जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि मामला केवल सेटबैक अतिक्रमण तक सीमित नहीं था, बल्कि जेडीए स्वीकृत मानचित्रों के बिना निर्माण भी किया गया था। इसके बावजूद, जेडीए के धारा 32-33 के नोटिस जारी होने के बाद दूसरी मंजिल की छत तक शटरिंग कर दी गई। उल्लेखनीय है कि जेडीए अपने नोटिस में अवैध निर्माण हटाने के लिए अधिकतम सात दिन का समय देता है।
राहत नहीं मिलने पर खुद हलफनामा पेश करते हैं निर्माणकर्ता
जेडीए प्रवर्तन शाखा के अनुसार, अवैध निर्माण सामने आने पर नोटिस देकर सात दिन का समय दिया जाता है। इसके बावजूद निर्माणकर्ता कोर्ट चले जाते हैं। मामला लंबा खिंचता है और जब कोई राहत नहीं मिलती, तो वे खुद छह-छह महीने में अवैध निर्माण हटाने का हलफनामा पेश कर देते हैं, जिससे ट्रिब्यूनल में मामलों की पेंडेंसी लगातार बढ़ रही है।
इस संबंध में जेडीए प्रवर्तन शाखा के आईजी पुलिस राहुल कोटोकी ने बताया कि कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर कई निर्माणकर्ता जानबूझकर कार्रवाई टालते हैं, जिससे जेडीए की प्रवर्तन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।