Saturday, 29 August 2026

परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार का बड़ा पर्दाफाश, आरटीओ इंस्पेक्टर ने खड़ी की अवैध वसूली की संगठित गैंग


परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार का बड़ा पर्दाफाश, आरटीओ इंस्पेक्टर ने खड़ी की अवैध वसूली की संगठित गैंग

परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका बड़ा खुलासा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की कार्रवाई में सामने आया है। एसीबी की जांच में उजागर हुआ है कि एक आरटीओ इंस्पेक्टर ने सुनियोजित तरीके से अवैध वसूली की पूरी गैंग खड़ी कर रखी थी। इस गैंग में कई निजी दलाल शामिल थे, जिनका फिक्स कमीशन तय था। वाहनों, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य परिवहन कार्यों की एक निर्धारित सूची के आधार पर रिश्वत की रकम वसूली जाती थी और यह रकम सीधे आरटीओ इंस्पेक्टर तक पहुंचाई जाती थी।

एसीबी के अनुसार राजस्थान के हाईवे क्षेत्रों में अवैध और ओवरलोडिंग वाहनों की बाकायदा सूची बनाई जाती थी। इन्हीं सूचियों के आधार पर दलाल वाहन मालिकों और ड्राइवरों से नियमित रूप से रिश्वत वसूलते थे। इस अवैध वसूली के खेल का खुलासा होने के बाद एसीबी ने मामला दर्ज कर सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए गहन जांच शुरू कर दी है।

सर्विलांस से खुली पूरी साजिश:
एसीबी में दर्ज एफआईआर के मुताबिक, मुख्यालय को सूचना मिली थी कि राजस्थान के हाईवे पर आरटीओ के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध वसूली हो रही है। जांच में सामने आया कि परिवहन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी निजी दलालों के साथ मिलीभगत कर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। प्रारंभिक जांच में ऋषिराज सिंह, विक्रम प्रताप सिंह और निर्मल के नाम सामने आए। इसके बाद एसीबी ने तीनों आरोपियों के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लिए।

कॉल रिकॉर्ड और बातचीत के विश्लेषण के दौरान जगजीत सिंह उर्फ जगत बन्ना, प्रदीप सिंह जोधा और विक्रम प्रताप सिंह के एक अन्य मोबाइल नंबर भी सामने आए। कुल छह मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लेने के बाद अवैध वसूली की पूरी पोल खुल गई।

मासिक बंधी और प्रति वाहन रिश्वत का सिस्टम:
एसीबी की जांच में यह भी सामने आया कि अजमेर, ब्यावर और केकड़ी में तैनात परिवहन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी मध्यस्थ दलालों के जरिए ओवरलोडिंग और अवैध वाहनों पर कार्रवाई नहीं करने के बदले रिश्वत वसूल रहे थे। इसके लिए मासिक बंधी तय थी, साथ ही प्रति वाहन नियमित रूप से रिश्वत ली जाती थी।

दलालों के जरिए इकट्ठी की गई रिश्वत की रकम परिवहन निरीक्षक (आरटीओ इंस्पेक्टर) जल सिंह के लिए जमा की जाती थी। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ऋषिराज सिंह द्वारा वसूली गई रकम निजी दलाल प्रदीप सिंह जोधा के माध्यम से ब्यावर में किसी तय स्थान पर जल सिंह को दी जाती थी।

दलालों ने बना रखा था कॉल सेंटर जैसा नेटवर्क:
जांच में खुलासा हुआ कि दलालों ने वाहन ड्राइवरों से अवैध वसूली के लिए कॉल सेंटर जैसी व्यवस्था बना रखी थी। मोबाइल मैसेजिंग, डिजिटल पेमेंट और हाईवे के ढाबों के जरिए रिश्वत का लेन-देन होता था। अलग-अलग मोबाइल नंबरों का उपयोग कर वाहन नंबर फॉरवर्ड किए जाते थे, जिससे वसूली और भुगतान आसान हो जाता था।

आरटीओ इंस्पेक्टर के ट्रांसफर के बाद दलालों ने 3–4 दिन तक वसूली की रकम अपने पास रोक ली थी, ताकि बाद में कम रकम देनी पड़े।

कोड वर्ड और छापेमारी में मिले अहम सबूत:
डीआईजी अनिल कयाल के सुपरविजन में एसीबी की 12 टीमों ने ब्यावर, नसीराबाद, विजयनगर, केकड़ी, किशनगढ़ और अजमेर में 11 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। तलाशी के दौरान होटल, चाय की दुकानों और हाईवे ढाबों के आसपास अवैध वसूली के सबूत मिले। दलाल कैश और पेटीएम के जरिए रकम लेकर कोड वर्ड में उड़नदस्ते को सूचना देते थे।

मांगलियावास (अजमेर) स्थित ऋषिराज सिंह के घर से डॉक्यूमेंट, कैश और वाहनों की रजिस्ट्रेशन नंबरों की सूची बरामद हुई। उसकी पत्नी के मोबाइल में भी ट्रकों और व्यवसायिक वाहनों की सूची और स्कैन की गई तस्वीरें मिलीं।

जांच में यह भी सामने आया कि प्रति वाहन 800 से लेकर 1500 रुपए तक की रिश्वत वसूली जा रही थी। आरटीओ इंस्पेक्टर जल सिंह ने ही कमीशन के आधार पर हाईवे पर दलालों की पूरी फौज खड़ी कर रखी थी।

13 आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज:
एसीबी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ज्ञान प्रकाश नवल ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आरटीओ इंस्पेक्टर सहित कुल 13 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। सभी आरोपियों की भूमिका की गहराई से जांच की जा रही है और आगे भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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