



केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी है, जिसमें राजस्थान की लोककला और अध्यात्म को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सम्मान मिला है। इस वर्ष पद्मश्री पुरस्कार के लिए राजस्थान की तीन प्रतिष्ठित हस्तियों—प्रसिद्ध भपंग वादक गफरूद्दीन मेवाती जोगी, अलगोजा वादक तगा राम भील और ब्रह्म देव महाराज—का चयन किया गया है। यह सम्मान राजस्थान की समृद्ध लोक-संस्कृति और परंपरागत कला को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
डीग जिले के मूल निवासी गफरूद्दीन मेवाती जोगी वर्तमान में अलवर में रह रहे हैं। वे भपंग वादन और ‘पांडुन का कड़ा’ के एकमात्र जीवित कलाकार माने जाते हैं। उन्हें भपंग वादन में असाधारण महारत हासिल है और वे देश-विदेश में अनेक मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। उनके पास ‘पांडुन का कड़ा’ के 2500 से अधिक दोहे स्मरण में हैं। वर्ष 2016 में उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार तथा 2024 में राष्ट्रपति पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किया जा चुका है। गफरूद्दीन ने बताया कि उनके परिवार में आठ पीढ़ियों से सारंगी और भपंग वादन की परंपरा चली आ रही है, जिसे उन्होंने बचपन से आत्मसात किया।
जैसलमेर निवासी तगा राम भील देश के जाने-माने अलगोजा वादक हैं। उन्होंने अपनी अनूठी वादन शैली से यूरोप, अमेरिका, रूस, जापान और अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा का परचम लहराया है। बचपन में पिता से प्रेरणा लेकर उन्होंने अलगोजा सीखना शुरू किया और महज 10 वर्ष की उम्र में इसमें दक्षता हासिल कर ली। वर्ष 1981 में जैसलमेर में पहला मंच मिलने के बाद उनका सफर निरंतर आगे बढ़ता गया। वे राजस्थान के प्रसिद्ध ‘मरु महोत्सव’ की स्थायी पहचान बन चुके हैं। अलगोजा के साथ मटका और बांसुरी वादन में भी उन्हें विशेष दक्षता प्राप्त है।
ब्रह्म देव महाराज को भी सामाजिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। इन तीनों हस्तियों को मिला यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि राजस्थान की लोकसंस्कृति, परंपरा और कला के लिए गर्व का क्षण है।