



लखनऊ। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने लखनऊ में आयोजित 86 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में विधायिका की भूमिका, जवाबदेही और भविष्य की चुनौतियों पर एक दूरदर्शी और विचारोत्तेजक उद्बोधन दिया। उन्होंने विधायिका को भारतीय लोकतंत्र की धड़कन बताते हुए कहा कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव जनता का अडिग विश्वास होता है। यह विश्वास केवल निरंतर संवाद, पारदर्शिता और उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण से ही कायम रह सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे हाथों में जो शक्ति है, वह जनता द्वारा दी गई पवित्र धरोहर है और विधायकों को संविधान के ट्रस्टी के रूप में कार्य करना चाहिए।
विधानसभा अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि विधायिका कोई स्वतंत्र सत्ता-केंद्र नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का दर्पण है। सदन में बैठने वाला प्रत्येक सदस्य लाखों नागरिकों की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधि होता है। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अधिकार पहुंचे। जवाबदेही केवल चुनाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सदन के प्रत्येक सत्र, प्रत्येक बहस और प्रत्येक विधायी हस्तक्षेप में परिलक्षित होनी चाहिए। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता को रोजमर्रा के विधायी आचरण का अनिवार्य हिस्सा बताया।
विधानसभा अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि सदन की श्रेष्ठता बहुमत की संख्या से नहीं, बल्कि अल्पमत की आवाज को दिए गए सम्मान से तय होती है। स्वस्थ असहमति और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र की मजबूती का आधार हैं। उन्होंने कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण को विधायिका का प्रमुख संवैधानिक दायित्व बताते हुए कहा कि जनता के कर से एकत्रित प्रत्येक रुपये का उपयोग जनकल्याण में हो, यह सुनिश्चित करना विधायिका की जिम्मेदारी है। प्रश्नकाल, शून्यकाल और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों को उन्होंने जनता की आवाज का सशक्त माध्यम बताया।
विधायी समितियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए विधानसभा अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि समितियां “लघु सदन” के रूप में कार्य करती हैं, जहां गहन और तकनीकी समीक्षा संभव होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समिति प्रतिवेदन केवल फाइलों तक सीमित न रहें, बल्कि उन पर सदन में चर्चा हो और सरकार द्वारा की गई कार्यवाही का विवरण अनिवार्य रूप से प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने बताया कि राजस्थान विधानसभा में लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति के माध्यम से वित्तीय अनुशासन को मजबूत किया गया है। साथ ही, बाल विधानसभा, यूथ पार्लियामेंट और सदस्यों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से लोकतांत्रिक मूल्यों को भावी पीढ़ी तक पहुंचाया जा रहा है।
डिजिटल नवाचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज डिजिटल जवाबदेही का युग है। राजस्थान विधानसभा ने पेपरलेस कार्यप्रणाली, यूट्यूब पर कार्यवाही का सजीव प्रसारण और डिजिटल म्यूज़ियम जैसे कदम उठाकर पारदर्शिता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। उन्होंने लेजिस्लेटिव इम्पैक्ट असेसमेंट और पोस्ट-लेजिस्लेटिव ऑडिट की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि कानूनों के वास्तविक प्रभाव का आकलन हो सके और जनता को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाया जा सके।
पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर बोलते हुए विधानसभा अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि अध्यक्ष का आसन केवल रेफरी का नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक का होता है। नियमों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो चर्चा को सीमित न करे, बल्कि उसे व्यापक बनाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र कोई अंतिम मंज़िल नहीं, बल्कि एक निरंतर यात्रा है और इस यात्रा में विधायिका जनता के विश्वास के ईंधन से आगे बढ़ती है। उन्होंने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को बधाई दी और सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।