



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में आयोजित सत्र ‘इमेजिन: द न्यू होराइजंस ऑफ क्रिएटिविटी’ में मशहूर गीतकार, लेखक और विज्ञापन जगत के दिग्गज प्रसून जोशी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मानवीय रचनात्मकता पर अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि AI में इंसानों जैसी रचनात्मकता और कल्पना नहीं होती। AI एक उपयोगी टूल जरूर है, लेकिन उसे मनुष्य के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि AI को एक एक्सटेंशन या सहायक साधन के रूप में समझा जाए, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है।
प्रसून जोशी ने कहा कि रचनात्मकता केवल डेटा या एल्गोरिदम से नहीं आती, बल्कि वह जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं और संघर्षों से जन्म लेती है। AI चीजों को प्रोसेस कर सकता है, पैटर्न समझ सकता है, लेकिन अनुभूति और कल्पनाशीलता वह गुण हैं, जो केवल मनुष्य में ही संभव हैं।
अपने निजी जीवन का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पिता एजुकेशन ऑफिसर थे, जबकि उनकी मां का जुड़ाव संगीत से था। उन्होंने कहा कि आज वे अपने जीवन में शिक्षा और संगीत—दोनों के संस्कारों को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं। यही संतुलन उनकी रचनात्मक यात्रा की नींव बना।
प्रसून जोशी ने जीवन के संघर्षों को रचनात्मकता का आधार बताते हुए एक सुंदर उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि पहाड़ी इलाकों में नीचे गिरे हुए पत्थर देखने में बेहद खूबसूरत लगते हैं, जैसे किसी कलाकार ने उन्हें तराशा हो, जबकि वास्तव में उन्हें ठोकरों ने तराशा होता है। उन्होंने कहा कि उनका खुद का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा है—संघर्षों और ठोकरों ने उन्हें संवारा और मजबूत बनाया।
इस सत्र में प्रसून जोशी के विचारों ने यह संदेश दिया कि तकनीक चाहे जितनी उन्नत हो जाए, लेकिन मानवीय संवेदना, कल्पना और अनुभव का कोई विकल्प नहीं हो सकता। रचनात्मकता का भविष्य तकनीक के साथ सहयोग में है, न कि उसके अधीन होने में।