



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में रविवार को भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने राष्ट्रीय सुरक्षा, जमानत व्यवस्था, अंडरट्रायल कैद और संवैधानिक मूल्यों को लेकर बेहद स्पष्ट और बेबाक विचार रखे। उमर खालिद मामले पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानून कई बार ‘निर्दोषता की पूर्वधारणा (presumption of innocence)’ की जगह ‘दोष की धारणा (presumption of guilt)’ को प्राथमिकता देने लगते हैं, जो बेहद चिंताजनक है। अदालतों का दायित्व है कि वे यह जांचें कि क्या वास्तव में मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और क्या हिरासत आवश्यक व अनुपातिक (proportionate) है। अन्यथा लोग वर्षों तक जेल में सड़ते रहते हैं।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि किसी मामले में ट्रायल उचित समय में पूरा नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। संविधान सर्वोच्च है और सामान्य परिस्थितियों में बेल नियम होनी चाहिए, जेल अपवाद। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्री-ट्रायल बेल किसी भी तरह से सजा नहीं हो सकती, क्योंकि भारतीय आपराधिक कानून की बुनियाद इस सिद्धांत पर टिकी है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक आरोपी निर्दोष माना जाता है।
उमर खालिद के संदर्भ में बोलते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि वे अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बात कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति 5 से 7 साल तक अंडरट्रायल के रूप में जेल में रहे और बाद में बरी हो जाए, तो उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में बेल से इनकार उचित हो सकता है—जैसे आरोपी के सीरियल अपराधी होने, समाज के लिए गंभीर खतरा बनने, फरार होने की आशंका या सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना होने पर। लेकिन यदि ये तीनों परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो बेल से इनकार करना न्यायसंगत नहीं है।
उन्होंने स्वीकार किया कि अपनी ही संस्था की आलोचना करना उनके लिए आसान नहीं है, क्योंकि एक साल पहले तक वे सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व कर रहे थे। बावजूद इसके उन्होंने कहा कि सिद्धांत यही कहते हैं कि यदि ट्रायल आगे नहीं बढ़ पा रहा है, तो शर्तें लगाकर भी जमानत पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
सत्र के दौरान उन्होंने जेन-जी (Gen Z) को समझने की आवश्यकता पर भी बात की। उन्होंने कहा कि वे भले ही बेबी बूमर पीढ़ी से आते हों, लेकिन उनकी दो बेटियां स्पेशल नीड्स वाली हैं और जेन-जी से हैं। यदि उन्हें अपनी बेटियों और नई पीढ़ी की दुनिया से जुड़ा रहना है, तो उन्हें जेन-जी के सोचने और काम करने के तरीकों को समझना और अपनाना होगा।
अपनी हालिया किताब का जिक्र करते हुए चंद्रचूड़ ने बताया कि यह कोई कठोर कानूनी ग्रंथ नहीं, बल्कि उनके भाषणों का संग्रह है। इसमें भारतीय और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के साथ-साथ जॉन स्टुअर्ट मिल, कांट जैसे दार्शनिकों के संदर्भ भी स्वाभाविक रूप से आए हैं। उन्होंने याद किया कि जब वे समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने वाला ऐतिहासिक फैसला लिख रहे थे, तब उन्हें कवि-गायक लियोनार्ड कोहेन का वह प्रसिद्ध कथन याद आया था, जो लोकतंत्र के खतरे और उसके बावजूद उम्मीद की बात करता है। उनके अनुसार कुछ फैसले सीधे-सपाट होते हैं, जबकि कुछ में संवेदनशीलता और सोच का ‘फ्लोरिश’ जरूरी होता है।