Saturday, 29 August 2026

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: सुधा मूर्ति ने ‘द मैजिकल ऑफ द लॉस्ट ईयररिंग्स’ के जरिए विभाजन, स्मृतियों और संस्कारों की कहानी बुनी


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: सुधा मूर्ति ने ‘द मैजिकल ऑफ द लॉस्ट ईयररिंग्स’ के जरिए विभाजन, स्मृतियों और संस्कारों की कहानी बुनी

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन फ्रंट लॉन में आयोजित सत्र ‘द मैजिकल ऑफ द लॉस्ट ईयररिंग्स’ भावनाओं, इतिहास और स्मृतियों से सराबोर रहा। प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति की इसी नाम की पुस्तक पर आधारित इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मंदिरा नायर ने किया। संवाद की शुरुआत में मंदिरा नायर ने सुधा मूर्ति से पूछा कि उन्होंने यह किताब अपनी पोती के लिए क्यों लिखी और इसके केंद्र में भारत-पाकिस्तान विभाजन को ही क्यों रखा। इस पर सुधा मूर्ति ने सहज और आत्मीय अंदाज में बताया कि यह पुस्तक उन्होंने अपनी ग्रैंडडॉटर नॉनी के लिए लिखी है, जो लंदन में रहती है। वे चाहती थीं कि उनकी पोती अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों के संघर्ष और उस भूमि के इतिहास को समझे, जहां से उसका परिवार आया है।

सुधा मूर्ति ने बताया कि उनकी बेटी की शादी ऋषि सुनक से हुई है और उनके दादा-दादी लाहौर और एबटाबाद से थे। विभाजन के दौरान उन्हें सब कुछ छोड़ना पड़ा और वे पहले नैरोबी, फिर दार-एस-सलाम और अंततः लंदन पहुंचे। उन्होंने दो बार अपना घर खोया। लेखिका ने कहा कि आज की पीढ़ी स्वतंत्रता और जमीन को सहज मान लेती है, जबकि इसके पीछे पीढ़ियों का संघर्ष छिपा है। बच्चों को उपदेश देकर नहीं, बल्कि कहानियों के माध्यम से इतिहास समझाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने इस कथा को दादी और पोती के संवाद के रूप में बुना।

पुस्तक के विषय पर बात करते हुए सुधा मूर्ति ने बताया कि यह उनकी सीरीज की तीसरी किताब है। पहली किताब में उन्होंने भारत के खोए हुए मंदिरों और उनकी वास्तुकला पर लिखा, दूसरी में नदियों के महत्व को रेखांकित किया और तीसरी किताब में विभाजन को केंद्र में रखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर हम इतिहास नहीं जानते, तो भविष्य को भी नहीं समझ सकते, क्योंकि इतिहास और भविष्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। इस कहानी को प्रामाणिक बनाने के लिए उन्होंने अमृतसर, उज्जैन, दिल्ली और लंदन के संग्रहालयों का दौरा किया और यहां तक कि हवाई अड्डों पर बैग बदलने की प्रक्रिया को भी स्वयं देखा, ताकि कथा यथार्थ के अधिक करीब हो सके।

सुधा मूर्ति ने कहा कि यह किताब केवल एक जोड़ी बालियों की कहानी नहीं है, बल्कि खोई हुई जमीन, संस्कृति और रिश्तों की कहानी है। जैनब और सिमरन जैसे पात्रों के माध्यम से उन्होंने हिंदू-मुस्लिम दोस्ती, पंजाब की साझा संस्कृति और ईद-दीपावली साथ मनाने की परंपरा को जीवंत किया है। जैनब द्वारा दी गई बालियां केवल आभूषण नहीं, बल्कि दोस्ती, स्मृतियों और पंजाब की मिट्टी की प्रतीक हैं। जब ये बालियां खो जाती हैं, तो जो पीड़ा होती है, उसे खरीदा नहीं जा सकता, क्योंकि वह बीते हुए सुनहरे दिनों की निशानी होती है।

सत्र के दौरान सुधा मूर्ति ने आज के बच्चों और अभिभावकों को भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन केवल सुखों का नाम नहीं है। आज के बच्चे छोटी-छोटी बातों पर अवसाद की बात करने लगते हैं, जबकि पिछली पीढ़ियों ने कहीं अधिक कष्ट और बलिदान झेले हैं। माता-पिता बच्चों को सुविधाएं और खिलौने दे सकते हैं, लेकिन सबसे जरूरी है उन्हें संघर्ष सहने की क्षमता देना। असफलताओं को स्वीकार करना, आत्मविश्वास और दृढ़ता विकसित करना ही जीवन की असली पूंजी है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यूक्लियर परिवारों के दौर में बच्चों को दादा-दादी से मिलने वाले संस्कार कम हो रहे हैं, ऐसे में लेखकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

विभाजन पर अपने विचार रखते हुए सुधा मूर्ति ने इसे एक गलत निर्णय बताया, जिसने लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया। उन्होंने पाकिस्तान यात्रा के दौरान तक्षशिला संग्रहालय और रावलपिंडी में अपने पुराने घरों को देखने के अनुभव साझा किए, जहां लोगों की आंखों में आज भी पीड़ा झलकती है। उन्होंने विशेष रूप से सिंधी समुदाय का उल्लेख करते हुए कहा कि सिंधियों ने न केवल अपनी जमीन, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति भी खो दी। आने वाली पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि मातृभाषा, भूमि और संस्कृति कितनी महत्वपूर्ण होती है। सत्र का समापन इस भावुक संदेश के साथ हुआ कि बच्चों को विभाजन का इतिहास जरूर जानना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए।

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