



जयपुर। आज़ादी के बाद शाही परिवारों और चुनावी राजनीति के बीच संबंधों पर बातचीत करते हुए जोधपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य गज सिंह ने कहा कि उनके पिता स्वतंत्र भारत के पहले शाही सदस्यों में थे, जिन्होंने 1952 में चुनाव लड़कर शाही परिवारों के चुनावी राजनीति में प्रवेश की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि उस दौर में उनके पिता ने विभिन्न शाही परिवारों को एकजुट किया और कई सीटों पर सफलता भी हासिल की। गज सिंह ने यह भी साझा किया कि वे स्वयं 1990 से 1992 तक संसद के ऊपरी सदन (राज्यसभा) के सदस्य रहे, लेकिन राजनीति को उन्होंने कभी अपना प्रमुख लक्ष्य नहीं माना। उनका मानना था कि लोगों की सेवा राजनीति से बाहर रहकर भी बेहतर ढंग से की जा सकती है।
गज सिंह ने कहा कि उनके परिवार के लगभग सभी सदस्य किसी न किसी रूप में राजनीति से जुड़े रहे हैं, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत रूप से यह क्षेत्र अधिक आकर्षक नहीं लगा। उन्होंने इंदिरा गांधी जैसी दिग्गज नेताओं को नजदीक से देखा, पर अनुभव के साथ यह महसूस किया कि अपने काम स्वयं करना और समाज की सेवा करना उनके लिए अधिक संतोषजनक है।
19 वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी आत्मकथा ‘बापजी: द किंग हू वुड बी मैन’ के लोकार्पण के दौरान गज सिंह ने भारत के इतिहास और शाही परंपराओं पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि राजा की कोई जाति नहीं होती—उन्हें बचपन से यही सिखाया गया था। जाति व्यवस्था होने के बावजूद उनके महल के दरवाजे सभी वर्गों के लिए खुले रहते थे और हरिजन समाज के लोग भी नियमित रूप से उनसे मिलने आते थे।
भारत के निर्माण में राजपूतों के योगदान को याद करते हुए गज सिंह ने कहा कि राजपूतों ने अपने धर्म और मूल्यों को बनाए रखते हुए देश की रक्षा की। यही कारण है कि भारत कभी भी पूरी तरह से मुस्लिम राष्ट्र नहीं बन पाया। उन्होंने कहा कि मुगल आगे इसलिए नहीं बढ़ सके, क्योंकि उनके सामने राजपूतों का साहस और प्रतिरोध खड़ा था।
उन्होंने अपने जीवन के कठिन दौर का जिक्र करते हुए बताया कि 1971 में शाही व्यवस्था समाप्त होने के बाद उनका और उनके परिवार का जीवन पूरी तरह बदल गया। उस समय उनकी मां बेहद मुश्किल स्थिति में थीं। इसके बाद वे लंदन से भारत लौटे और जीवन को दोबारा स्थिर करने के लिए ट्रस्ट और अन्य व्यवसाय शुरू किए। यह उनके लिए बड़ा दायित्व और चुनौतीपूर्ण समय था।
गज सिंह ने भावुक अंदाज़ में कहा कि उन्हें चार साल की उम्र से ‘बापजी’ कहा जाने लगा, जो जोधपुर में एक आम संबोधन है। उन्होंने खुद को एक साधारण व्यक्ति बताते हुए कहा कि वे अंततः एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने अपने पिता की विरासत को संभालने और समाज के लिए कुछ करने का प्रयास किया।