Saturday, 29 August 2026

भाषा आस्था नहीं, पहचान से जुड़ी होती है : जावेद अख्तर


भाषा आस्था नहीं, पहचान से जुड़ी होती है : जावेद अख्तर

जयपुर में आयोजित सांस्कृतिक उत्सव जनवरी ऑफ जयपुर के दौरान सिनेमा और साहित्य जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर ने भाषा और पहचान पर बेबाक विचार रखे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश का इतिहास बताता है कि वहां के लोग अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए खड़े हुए। मुस्लिम होने के बावजूद उन्होंने उर्दू को अपनाना आवश्यक नहीं समझा, क्योंकि भाषा आस्था से नहीं बल्कि पहचान से जुड़ी होती है। अख्तर ने कहा कि किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है—भाषा का संबंध समाज और क्षेत्र से होता है, न कि धर्म से।

जावेद अख्तर ने हिंदी और उर्दू के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों भाषाओं की व्याकरण एक ही है, जो विश्व में बहुत कम देखने को मिलता है। उन्होंने इन्हें एक ही मां ‘खड़ी बोली’ की बेटियां बताया। उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक ही धर्म के बावजूद अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं, जो यह साबित करता है कि भाषा और धर्म को जोड़कर देखना ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से गलत है।

यह विचारोत्तेजक संवाद जयमहल पैलेस में आयोजित भव्य कार्यक्रम के दौरान हुआ, जहां जावेद अख्तर और सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना, पं. बिरजू महाराज की पौत्री शिंजिनी कुलकर्णी के बीच रोचक बातचीत ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। साहित्य, सिनेमा और शास्त्रीय कला के इस संगम ने पूरे माहौल को सांस्कृतिक रंगों से भर दिया।

कार्यक्रम के दौरान जावेद अख्तर ने अपनी चर्चित नज़्म ‘मैं भूल जाऊं सुनाई, जिसे सुनकर सभागार तालियों की गूंज से भर उठा। उनकी प्रस्तुति ने न केवल श्रोताओं को भावनात्मक रूप से छुआ, बल्कि भाषा और अभिव्यक्ति की शक्ति को भी एक बार फिर रेखांकित किया।

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