



जयपुर। रिश्वत मांगने के एक बहुचर्चित मामले में राजस्थान पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) विष्णुकांत को बड़ी राहत मिली है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने उनके खिलाफ दर्ज प्रकरण में अंतिम रिपोर्ट (एफआर) लगाते हुए साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही है। वहीं, आरपीएस अधिकारी दिव्या मित्तल को भी सरकार की ओर से क्लीनचिट दे दी गई है। यह मामला उस समय का है जब विष्णुकांत एसीबी में डीआईजी के पद पर तैनात थे। प्रकरण फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है, जहां पहले साक्ष्यों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए थे।
इस पूरे मामले में एसीबी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि परिवादी द्वारा पेश किए गए ऑडियो और वीडियो साक्ष्यों की एफएसएल जांच कराए बिना ही एसीबी ने एफआर लगाने का निर्णय ले लिया। इससे यह संदेह गहराया है कि क्या जांच निष्पक्ष तरीके से की गई या नहीं। उल्लेखनीय है कि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मई 2024 में एसीबी ने एफआईआर दर्ज की थी, जबकि इससे पहले शिकायत के बावजूद मामला दर्ज नहीं किया गया था।
एसआई सत्यपाल पारीक ने एसीबी को शिकायत दी थी कि जवाहर सर्किल थाने में तैनात हैडकांस्टेबल सरदार सिंह का नाम केस से हटाने के बदले 10 लाख रुपए की रिश्वत मांगी गई। आरोप था कि यह राशि तत्कालीन डीआईजी विष्णुकांत ने अपने गनमैन प्रताप सिंह के माध्यम से एसीबी डीजी के नाम पर मांगी। बताया जाता है कि 9.50 लाख रुपए का लेनदेन हुआ, जिसके बाद सरदार सिंह का नाम केस से हटा दिया गया और दूसरे आरोपी कांस्टेबल लोकेश कुमार शर्मा के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।
जांच में यह भी सामने आया कि जांच अधिकारी ने लोकेश कुमार के खिलाफ चालान पेश कर दिया, जबकि सरदार सिंह के खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा कर मामला समाप्त कर दिया गया। उप निदेशक अभियोजन की राय के बावजूद तत्कालीन डीआईजी विष्णुकांत ने सरदार सिंह के खिलाफ अपराध प्रमाणित नहीं माना। अब एसीबी द्वारा एफआर लगाए जाने के बाद पूरे घटनाक्रम पर फिर से बहस शुरू हो गई है और न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दिए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।