



राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बैन मामले पर बुधवार को राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस समीर जैन ने अपने निर्णय में कहा कि छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें शिक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आवश्यक हैं, परंतु उनका आयोजन शैक्षणिक हितों को प्रभावित किए बिना होना चाहिए।
इस फैसले में सबसे अहम बात यह रही कि हाईकोर्ट ने छात्रसंघ चुनाव करवाने की संभावनाओं पर विचार करने के लिए एक कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। यह कमेटी चुनाव प्रक्रिया, समय और तरीके पर सरकार को सुझाव देगी।
फैसला आने के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि वे कोर्ट के निर्णय से खुश हैं, क्योंकि इससे छात्रसंघ चुनाव करवाए जाने की दिशा में रास्ता खुला है। कमेटी की सिफारिशें आने के बाद चुनावों पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू करने के कारण फिलहाल छात्रसंघ चुनाव कराना संभव नहीं है। शिक्षा में सुधार और संरचनात्मक बदलावों के चलते चुनाव व्यवस्था को अभी रोकना आवश्यक है। सरकार का यह भी कहना था कि छात्रसंघ चुनाव मौलिक अधिकार नहीं हैं, इसलिए इन्हें टाला जा सकता है।
लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के अनुसारसत्र शुरू होने के 8 सप्ताह के भीतर छात्रसंघ चुनाव कराए जाने चाहिए।लेकिन इस बार निर्धारित समयसीमा निकल चुकी थी, जिससे छात्र और याचिकाकर्ता नाराज थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों का लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक अधिकार है। उन्हें इससे वंचित करना उनकी भागीदारी और नेतृत्व क्षमता पर रोक लगाने जैसा है। कोर्ट ने इन तर्कों पर सहमति जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में चुनाव महत्वपूर्ण हैं, पर शिक्षा सर्वोपरी है।