



जयपुर। वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार और साहित्यकार डॉ. यश गोयल का गुरुवार को 16 अक्टूबर शाम बीमारी के चलते निधन हो गया। वे रक्त कैंसर (ब्लड कैंसर) से पीड़ित थे और पिछले कुछ समय से उपचाराधीन थे। उनके निधन से साहित्य और पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
डॉ. यश गोयल ने वर्ष 1978 में जोधपुर से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। वे लंबे समय तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से जुड़े रहे और जयपुर, दिल्ली एवं लखनऊ जैसे प्रमुख शहरों में पत्रकारिता करते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई।
पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। अमेरिका में रहते हुए उन्होंने विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में भी कार्य किया और इसे अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। एक व्यंग्यकार के रूप में डॉ. गोयल ने अपनी रचनाओं से राजनीति और समाज की विडंबनाओं पर गहरी चोट की, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुईं।
डॉ. यश गोयल को राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘कन्हैयालाल सहल पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें उनकी चर्चित व्यंग्य कृति “नामुमकिन नेता” के लिए प्रदान किया गया था। उनकी अन्य लोकप्रिय पुस्तकों में —“गुण सूत्र”,“मंत्री का चश्मा”,“कुर्सी का देवदास” (व्यंग्य),“उतरा हुआ कोट”, और“कागज़ के हाथ” (कहानी संग्रह) शामिल हैं।
उनकी लेखनी में गहरी सामाजिक समझ, विनोदबुद्धि और समसामयिक व्यंग्य का सुंदर संतुलन देखने को मिलता है। वे अपने पीछे धर्मपत्नी और दो पुत्रों को छोड़ गए हैं।उनकी शवयात्रा शुक्रवार प्रातः 10 बजे उनके निवास जादौन नगर से मोक्ष धाम के लिए प्रस्थान करेगी।
राजस्थान और देशभर के पत्रकारों, साहित्यकारों और पाठकों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि डॉ. गोयल का जाना राजस्थान की व्यंग्य परंपरा और पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।