



जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल ट्रॉमा सेंटर में आग लगने से 8 मरीजों की मौत की घटना के बाद पूरे प्रदेश के अस्पतालों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। इसी क्रम में जोधपुर और भीलवाड़ा के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में मंगलवार को फायर फाइटिंग सिस्टम की जांच और मॉक ड्रिल की गई।
जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में मंगलवार को फायर फाइटिंग सिस्टम की मॉक ड्रिल की गई। इस दौरान एक काल्पनिक स्थिति तैयार की गई, जिसमें मरीजों और स्टाफ को आग लगने पर सुरक्षित बाहर निकालने का अभ्यास कराया गया।
अस्पताल के अधीक्षक डॉ. विकास राजपुरोहित ने बताया कि उच्च स्तर से मिले निर्देशों की पालना में यह अभ्यास किया गया। आर्टिफिशियल फायर क्रिएट करने पर सेंसर ने तुरंत धुएं को पहचान लिया और अलार्म बजने लगा। इसके बाद टीम ने मौके पर पहुंचकर आग पर नियंत्रण किया।
इस दौरान अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों को फायर सेफ्टी के बारे में जानकारी दी गई। मॉक ड्रिल में चिकित्सा अधिकारी डॉ. अंकित सोनी, डॉ. सुभाष बलारा, वर्कशॉप प्रभारी विपिन पुरोहित, गोपाल व्यास सहित पूरी टीम मौजूद रही।
भीलवाड़ा जिला मुख्यालय स्थित महात्मा गांधी अस्पताल में भी ICU और NICU सहित सभी वार्डों में अग्निशमन यंत्रों और उपकरणों की जांच की गई तथा स्टाफ से मॉक ड्रिल करवाई गई।
अस्पताल के पीएमओ डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि जयपुर हादसे के बाद यहां विशेष सतर्कता बरती जा रही है। अस्पताल के सभी चार ICU वार्ड—मेडिकल और कार्डियक सहित—में फायर सेफ्टी सिस्टम की समीक्षा की गई।
उन्होंने कहा कि सभी जगह अग्निशमन यंत्र चालू स्थिति में हैं और रखरखाव के लिए पीडब्ल्यूडी की एजेंसी को जिम्मेदार बनाया गया है। खर्च भी पीडब्ल्यूडी को जमा कराया गया है ताकि उपकरणों की नियमित जांच और देखभाल सुनिश्चित हो सके। भविष्य में किसी भी आगजनी या धुएं की स्थिति में ऑटोमेटिक सिस्टम सक्रिय हो, इसके लिए लगातार सुधार किए जा रहे हैं।
जयपुर SMS अस्पताल के हादसे के बाद राज्य सरकार ने सभी जिलों के अस्पतालों को फायर सेफ्टी सिस्टम की समीक्षा करने और मॉक ड्रिल कराने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य है कि भविष्य में इस तरह की त्रासदी न हो और अस्पतालों में भर्ती मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।