



जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव समय पर नहीं कराने को लेकर सरकार पर नाराज़गी जताई है। जस्टिस अनूप ढंड की अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि परिसीमन (Delimitation) के नाम पर चुनावों को अनिश्चितकाल तक स्थगित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने कहा कि “संविधान के अनुच्छेद 243-ई और पंचायतीराज अधिनियम की धारा 17 के तहत पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव होना अनिवार्य है। यदि चुनाव प्रक्रिया में देरी या विफलता होती है तो राज्य चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह हस्तक्षेप करके लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।” इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार से निर्देशित किया कि पंचायत चुनाव शीघ्र कराए जाएं।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष: प्रशासकों को बिना सुनवाई और बिना जांच के हटाया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।
सरकार का पक्ष: प्रशासक केवल अस्थायी व्यवस्था थे, इसलिए उन्हें हटाने के लिए किसी विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं।
कोर्ट ने माना कि बिना सुनवाई प्रशासकों को हटाना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है। इस कारण सरकार का आदेश रद्द कर दिया गया और निर्देश दिया कि दो माह में नए सिरे से जांच कर निर्णय लिया जाए।
गिरिराज सिंह देवंदा ने ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने को चुनौती दी थी। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने 55 नगर पालिकाओं का कार्यकाल नवंबर 2024 में पूरा होने के बाद भी चुनाव न कराने को चुनौती दी।
याचिकाओं में कहा गया कि सरकार का यह रवैया संवैधानिक प्रावधानों और पंचायतीराज/नगरपालिका अधिनियम-2009 का खुला उल्लंघन है।