



जयपुर राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में परिवार नियोजन को लेकर सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब नवविवाहित और युवा दंपती विवाह के तुरंत बाद संतान नहीं चाहते, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार होकर ही परिवार आगे बढ़ाने का निर्णय ले रहे हैं। इस सोच में बदलाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष है-अस्थायी गर्भनिरोधक साधनों का बढ़ता उपयोग।
परिवार कल्याण निदेशालय के परियोजना निदेशक डॉ. एसएस शेखावत ने बताया कि दो गर्भधारण के बीच उचित अंतर रखने से महिलाओं और नवजात दोनों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। बार-बार गर्भधारण करने से महिलाओं में एनीमिया, कमजोरी और जटिल प्रसव की आशंका बढ़ जाती है। वहीं, संतान में भी कुपोषण और देखभाल की कमी देखी जाती है।
अब ग्रामीण युवा दंपती ‘अंतरा’ इंजेक्शन, गर्भनिरोधक गोलियों, कंडोम और IUD (अंतर्गर्भाशयी यंत्र) जैसे सुरक्षित अस्थायी साधनों का उपयोग कर रहे हैं। यह उन्हें अपने परिवार की योजना अपने अनुसार तय करने का आत्मविश्वास और स्वतंत्रता देता है।
इस सकारात्मक बदलाव में आईपास संस्था की ‘विकल्प’ परियोजना अहम भूमिका निभा रही है। यह परियोजना सरकार के साथ मिलकर समुदाय तक व्यवहारिक और वैज्ञानिक जानकारी पहुंचा रही है।
‘विकल्प’ के राज्य परियोजना निदेशक अरुण नायर ने बताया कि “हमारा प्रयास सिर्फ सूचना देना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जिसमें हर महिला और दंपती स्वतंत्र रूप से सोच-समझ कर निर्णय ले सके।” परियोजना के अंतर्गत सास-बहू सम्मेलन, वीएचएसएनडी (ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस) और घर-घर संपर्क के माध्यम से जागरूकता फैलाई जा रही है।
‘सखी’ हेल्पलाइन (1800 202 5862) एक और महत्वपूर्ण सेवा है, जो हर दिन सुबह 8 से रात 8 बजे तक महिलाओं को नि:शुल्क, गोपनीय और सरल भाषा में परामर्श देती है।
एक ग्रामीण महिला ने बताया-शादी के तुरंत बाद आशा बहन ने हमें बताया कि गर्भधारण में देरी करना भी समझदारी है। हमने ‘अंतरा’ इंजेक्शन लिया और आज आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन को व्यवस्थित कर पा रहे हैं।”
यह बदलाव सिर्फ स्वास्थ्य के स्तर पर नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता देकर पूरे समाज को सशक्त बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।