



जयपुर के मानसरोवर स्थित एक ऑडिटोरियम में रविवार को चलकोई फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'इतिहास पर चर्चा' कार्यक्रम ने राजस्थान के इतिहास, भाषा और सांस्कृतिक धरोहर को केंद्र में रखते हुए एक नई चेतना जगाई। कार्यक्रम की मुख्य थीम कर्नल जेम्स टॉड के योगदान पर आधारित रही।
इस अवसर पर राजस्थान विधानसभा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग, प्रख्यात इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा, जयपुर के जिला कलेक्टर डॉ. जितेंद्र कुमार सोनी, और शिक्षाविद राजवीर सिंह चलकोई ने विचार साझा किए।
डॉ. रीमा हूजा ने अपने वक्तव्य में बताया कि कर्नल टॉड, जिनके पास कोई औपचारिक ऐतिहासिक प्रशिक्षण नहीं था, ने राजस्थान की जनजातियों, त्योहारों, परंपराओं और शौर्यगाथाओं का गहन अध्ययन कर उन्हें विस्तृत रूप में लिपिबद्ध किया। उन्होंने बताया कि टॉड ने ही सबसे पहले इस प्रदेश को "राजस्थान" नाम दिया, जो आगे चलकर 1949 में आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया।
सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि जब तक जनता अपने नेताओं को मजबूर नहीं करेगी, तब तक भाषा की मान्यता का सपना अधूरा रहेगा। आंदोलन खड़ा कीजिए, हम साथ हैं।
उन्होंने राणा सांगा को लेकर की गई हालिया विवादास्पद टिप्पणी पर भी कड़ा विरोध जताया और कहा कि इतिहास के साथ खिलवाड़ वोट बैंक की राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए।
जयपुर जिला कलक्टर डॉ. जितेंद्र सोनी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को महत्व देना अत्यंत सराहनीय है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुति और ऐतिहासिक विरासत का उत्सव
कार्यक्रम के दौरान जोगेश्वर गर्ग द्वारा प्रस्तुत राजस्थानी गीत ‘बैठो हूं आ तेवड़ ने...’ ने माहौल को भावविभोर कर दिया।
चलकोई फाउंडेशन के प्रवक्ता लोकेंद्र सिंह किलाणौत ने बताया कि यह आयोजन शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान दिवस को समर्पित है। सभी उपस्थितजनों ने दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी और वक्ताओं को कलम भेंट कर ‘शब्द क्रांति’ की मशाल आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम में भवानी निकेतन के युवराज सिंह, मन की खुशी फाउंडेशन की निदेशक पायल चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. क्षिप्रा माथुर, प्रशासनिक अधिकारी अरविंद सिंह, छात्र नेता शुभम रेवाड़, बीकानेर से एसएन जोशी, जोधपुर से मरुधर कंवर, कवि छैलू चारण छैल, व कई विश्वविद्यालयों के शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।