



राजस्थान में ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स पर अनिश्चितता बनी हुई है। अडानी, टोरेंट पावर, अवाडा वेंचर्स सहित छह बड़ी कंपनियों के प्रस्ताव लंबित हैं, लेकिन सरकार अभी ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रही है। प्रोजेक्ट मॉडल तय नहीं होने और भूमि आवंटन में रियायत की मांग के कारण देरी हो रही है।
ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की लागत अधिक:
सामान्य हाइड्रोजन ₹200/किलो में तैयार हो रहा है, जबकि ग्रीन हाइड्रोजन की लागत ₹350/किलो तक आ सकती है।
कंपनियां रियायती दरों पर जमीन चाहती हैं, लेकिन सरकार जल संसाधन और अक्षय ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेना चाहती है।
पानी की उपलब्धता चुनौती:
ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए पानी की जरूरत होगी, जबकि राजस्थान पहले से ही जल संकट झेल रहा है।
जल संसाधन विभाग मुख्य भूमिका में रहेगा, जिससे परियोजनाओं की स्वीकृति में देरी हो रही है।
1 रुपये टोकन रजिस्ट्रेशन फीस: पहले ₹30,000/मेगावाट था।
प्रोत्साहन योजना (RIPS): कंपनियों को ₹1 लाख/मेगावाट शुल्क देना होगा, पहले यह ₹5 लाख/मेगावाट था।
GST रिफंड: यदि कंपनियां स्थानीय निर्माताओं से उपकरण खरीदती हैं, तो उन्हें राज्य सरकार द्वारा GST में रिफंड मिलेगा।
अन्य रियायतें:
100% भूमि रूपांतरण शुल्क में छूट
व्हीलिंग चार्ज में 50% छूट
इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी में 100% छूट
गृह कंपनी से सहायक कंपनी को लीज ट्रांसफर पर शुल्क 150% से घटाकर 100%
मुख्यमंत्री कार्यालय को कंपनियों ने प्रस्ताव जल्द स्वीकृत करने की मांग भेजी है।
ऊर्जा विभाग और अक्षय ऊर्जा निगम इस पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।
सरकार को तय करना होगा कि रियायती दरों पर भूमि आवंटन किया जाए या नहीं