Saturday, 29 August 2026

आरसीए भंग मामले में हाईकोर्ट से अपील वापस, विधि के महत्वपूर्ण प्रश्न पर अब भी बना संशय


आरसीए भंग मामले में हाईकोर्ट से अपील वापस, विधि के महत्वपूर्ण प्रश्न पर अब भी बना संशय

राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद (आरसीए) को भंग करने के विवाद में हाईकोर्ट में दायर अपील को पूर्व सचिव भवानी शंकर सामोता और कोषाध्यक्ष रामपाल ने मंगलवार को वापस ले लिया। मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने अपील वापसी के आधार पर इसे खारिज कर दिया।

प्रमुख घटनाक्रम: अपील वापसी: अपीलार्थियों के अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल ने अदालत से अपील को वापस लेने का अनुरोध किया और कहा कि वे अपनी शिकायत क्रीड़ा परिषद के चेयरमैन के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि: 28 मार्च 2024 को राज्य सरकार ने आरसीए को भंग करने का आदेश जारी किया था।इस आदेश को चुनौती देते हुए भवानी शंकर सामोता और रामपाल ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।इससे पहले, एकलपीठ ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अपीलार्थियों को सहकारिता रजिस्ट्रार के आदेश के खिलाफ अपीलीय अधिकारी के समक्ष आपत्ति दर्ज करनी चाहिए थी।

विधि का प्रश्न:अदालत ने इस महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न को खुला रखा कि क्या क्रीड़ा परिषद के चेयरमैन, जो खेल सचिव भी हैं, स्वयं अपनी ही शिकायत के खिलाफ अपीलीय अधिकारी के तौर पर सुनवाई कर सकते हैं।अपीलार्थियों ने तर्क दिया कि खेल सचिव के पास इस मामले में अपील करने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि वह स्वयं क्रीड़ा परिषद का चेयरमैन और इस विवाद में एक पक्ष हैं।

सरकार का रुख:पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत से समय मांगकर इन बिंदुओं पर अपना जवाब देने की बात कही थी।

क्या है आगे की राह? अपीलार्थियों ने स्पष्ट किया कि वे अपनी आपत्ति क्रीड़ा परिषद के चेयरमैन के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।अदालत ने अपील को खारिज करने के बावजूद विधि के प्रश्न पर किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से परहेज किया है। इस मामले में यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि खेल सचिव जैसे अधिकारी को अपनी ही शिकायत पर सुनवाई का अधिकार है या नहीं।

आरसीए भंग मामले में अपीलार्थियों द्वारा अपील वापस लेने के बाद भी विधि का यह प्रश्न अनसुलझा है कि क्या खेल सचिव अपनी ही शिकायत पर अपीलीय अधिकारी के रूप में कार्य कर सकते हैं। यह मामला अब भी विधिक दृष्टिकोण से चर्चा का विषय बना हुआ है।

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