



19 अक्टूबर को काफी हाउस का जन्मदिन है, जो भारत में साहित्यकारों, पत्रकारों और बौद्धिक वर्ग के लिए एक विचार-विमर्श का स्थल रहा है। इस मौके पर के. विक्रम राव ने काफी हाउस के ऐतिहासिक सफर की चर्चा की। भारत में काफी हाउसों की शुरुआत 1500 के दशक में मक्का में हुई थी, जहाँ से यह धीरे-धीरे विश्व भर में फैल गया। भारत में यह खासतौर पर साहित्यिक और राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना।
शिमला, पटना, प्रयागराज और लखनऊ के काफी हाउस अपने साहित्यिक और बौद्धिक चर्चाओं के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। पटना के काफी हाउस में नागार्जुन ने अपनी प्रसिद्ध कविता "ना हम दक्षिण, ना हम वाम, जनता को रोटी से काम" की रचना की थी। इसी तरह, प्रयागराज और लखनऊ के काफी हाउसों में भी महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चाओं और आंदोलनों का उदय हुआ।
लखनऊ काफी हाउस में डॉ. राम मनोहर लोहिया से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया तब हुआ जब नेहरू-राजेंद्र प्रसाद के बीच चल रही बहस पर लोहिया ने कहा था कि "नेहरू जिस पद पर हैं, वही पद शक्तिशाली है।" इस प्रकार के तीखे राजनीतिक व्यंग्य और चर्चाएं काफी हाउस की पहचान बन गई थीं।
इतिहास में काफी की शुरुआत 1720 में मार्टीनिक से मानी जाती है, और भारत में इसकी उपज कर्नाटक की चंद्रगिरी पर्वतमाला से शुरू हुई। आज भी भारत में काफी हाउस विभिन्न शहरों में साहित्यिक और राजनीतिक चर्चाओं का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं।
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