


राजस्थान की संस्कृति और धरोहर विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन यहां बरसों से चली आ रहीं सामाजिक कुरीतियों का भी एक लंबा इतिहास है। इनमें बाल विवाह, जातिवाद, घूंघट प्रथा, दहेज प्रथा जैसी कई प्रथाएं शामिल हैं जिनके कारण यहां लड़कियों को काफी कुछ सहना पड़ा है और पड़ रहा है। इसके बावजूद यहां मीराबाई, पद्मावती और सावित्रीबाई फुले जैसे अनेक ऐतिहासिक नाम भी हैं जिन्होंने महिलाओं के हितों के लिए कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। ऐसे ही कुछ नाम वसुंधरा, नौरती, रेशमा, कोमल, ममता और निशा हैं जो टोंक जिले की पीपलू तहसील के आसपास के गांवों में रहती हैं। इन्होंने ना केवल बाल विवाह, जातिवाद, नुक्ता प्रथा सहित अन्य सामाजिक बुराइयों से लड़ने के लिए संघर्ष किया, बल्कि अन्य लड़कियों को प्रेरित भी कर रही हैं।
फ्यूचर सोसायटी के सहयोग से जयपुर के वरिष्ठ पत्रकारों का दल जब अनुसूचित जाति - जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाली इन बच्चियों से मिला तो इनके संघर्ष की हकीकत जानकर इन्हें रियल हीरो आफ राजस्थान कहा जा सकता है। इनका कहना है कि आज इनकी हिम्मत और हौसला तो बढ़ा है लेकिन उन्हें सरकार से सहयोग की भी कुछ उम्मीदें हैं, ताकि फिर किसी बहन की छोटी उम्र में शादी ना हो, किसी लड़की की पढ़ाई ना
छूटे और कोई उनसे जात-पात का सवाल ना करे...
सबसे पहले बात करते हैं टोंक जिले के सोहेला गांव की नौरती बैरवा की, जो बचपन से दिव्यांग हैं और आगे पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं। उन्होंने बताया कि विकलांग होने के कारण आसपास के लोग उन्हें ताना मारते थे। पढ़ाई के लिए भी जब पिता स्कूल छोड़ने जाते तो लोगों से यह सुनने को मिलता क्या करोगी पढ़कर, रहना तो घर पर ही है? जब कई बार ऐसी बात सामने आती तो पापा शादी के लिए सोचने लगते, क्योंकि उनका मानना था कि शादी हो जाएगी तो उनका बोझ भी कम हो जाएगा। धीरे-धीरे उम्र बढ़ी तो घरवालों को भी मुझे स्कूल छोड़ने में दिक्कत आने लगी।
पांचवी में स्थिति यह हो गई कि घर पर पापा नहीं होते थे तो स्कूल से छुट्टी हो जाती थी। 13-14 साल में ही शादी की बात चली तो इसका विरोध किया और पढ़ने की इच्छा जताई। इसी दौरान शिव शिक्षा समिति, रानोली के सीताराम सर गांव में आए और उन्होंने सरकारी योजनाओं के बारे में बताया। उनकी प्रेरणा से कलेक्टर साहब को स्कूल जाने में होने वाली परेशानी बताई तो 2 महीने बाद ट्राई साइकिल मिल गई। अब नौरती खुद ही स्कूल जाती हैं और अन्य दूसरी लड़कियों को भी जागरूक करती हैं। हालांकि, खुद पर बीत रही अनदेखी पीड़ा को बताते हुए नौरती रोने लग जाती हैं। कहती हैं कई बार ये तक सुनने को मिलता है कि...हम मर क्यों नहीं जाते! ऐसे में मन काफी विचलित होता है, लेकिन शिक्षित होने के कारण मन कहता कि ऐसा करना गलत है। इसके बाद खुद के साथ -साथ परिवार को भी हिम्मत बंधाती हैं।
उन्होंने बताया कि यह शिक्षा की ताकत है कि उनमें आत्मविश्वास पैदा हुआ और दसवीं बोर्ड में उन्होंने 60 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। उनका सपना टीचर बनने का है और वह खुद जैसी लड़कियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार से मदद की आशा करती हैं ताकि हालात भले ही विपरीत हो, पर शिक्षा किसी भी उम्र पर बाधित ना हो सके।
हमारी बच्चियों की शादियां रूकवाई हैं, तुम्हें यहां रहने का कोई हक नहीं
डारडा तुरकी गांव की रहने वाली 19 साल की वसुंधरा प्रजापत ने बताया कि परिवार में पहले से ही बाल विवाह होते रहे हैं। दादाजी कहते कि ब्याह जितना जल्दी हो जाए उतना अच्छा है। पांचवी में पढ़ने के दौरान ही घरवाले शादी के लिए लड़का ढूंढने लगे, लेकिन वह पढ़ना चाहती थी। दादाजी ने अपना फैसला भी बता दिया कि गांव में शादी होने तक पढ़ाई करे और उसके बाद लड़के वाले देखेंगे कि आगे पढ़ाई करनी है या नहीं। उनकी इन बातों से इतना डर लगने लगा की बाल विवाह नहीं करने की ठान ली। इसका अन्य कारण ये भी था जिन लड़कियों की शादी छोटी उम्र में हुई उन्हें दुखी ही देखा।
पारिवारिक झगड़ों के कारण आस-पड़ोस की कई लड़कियां रोती रहती थीं। क्योंकि परिवार में दो बहनों में वे ही कुछ पढ़ी-लिखी थी इसलिए बाल विवाह नहीं करने के बारे में मम्मी को बताया। कई दिनों तक ऐसे ही चर्चा का दौर चला, फिर बात पापा तक पहुंची और पापा से दादा तक। समिति से जुड़े लोगों ने भी मेरी मदद की और आखिरकार बाल विवाह होने से बच गई। इसके बाद तो मेरा आत्मविश्वास सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए और भी बढ़ता चला गया। इसी दौरान माहवारी के दौरान मां को पुराने तरीके अपनाते हुए देखा। चूंकि समिति में जुड़ने के बाद माहवारी के दौरान स्वच्छता रखने के बारे में जानकारी थी, तो सैनेटरी पेड के बारे में बताया। इसका परिणाम ये रहा कि गांव की अन्य महिलाओं को भी माहवारी के दौरान सैनेटरी पेड इस्तेमाल करने के लिए समझाया।
पंचायत से कलक्टर तक गांव में ही सैनेटरी पेड और उसके डिस्पोज करने की मशीन उपलब्ध करवाने के लिए मांग उठाई, जो पूरी हो गई। इसके बाद करीब 300 लड़कियों को माहवारी स्वच्छता की ट्रेनिंग दी। वसुंधरा के इसी आत्मविश्वास के चलते उन्होंने दसवीं में 72 प्रतिशत और 12वीं में 77 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। अब तक छह बाल विवाह उन्होंने रुकवाए, जिसका खामियाजा उन्हें सामाजिक बहिष्कार के रूप में झेलना पड़ा। गांव के लोग कहते थे कि तुमने हमारी बच्चियों की शादियां रूकवाई हैं तुम्हें यहां रहने का कोई हक नहीं है। इतना सुनने के बाद भी मैंने हार नहीं मानी और एक कदम आगे बढ़ाते हुए दादाजी की मौत पर मृत्युभोज पर होने वाले नुक्ता प्रथा को भी नहीं होने दिया। इसके बाद तो गांव में दुश्मन की तरह लोग उनको देखने लगे।
प्रशासन तक उनकी मुहिम के बारे में बात पहुंची तो उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक सम्मानित भी किया गया। इसके बाद जो लोग उनके विरोध में थे, वे भी आज उनका सम्मान करते हैं। सोशल मीडिया पर समूह बनाकर उनकी मुहिम में 300 लड़कियां और जुड़ गई हैं, जो अन्य लड़कियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक कर रहे हैं। पांचवी में खुद के बाल विवाह के विरोध में आवाज उठाने वाली वसुंधरा वर्तमान में बीए बीएड कर रही हैं और आईएएस बनने का सपना देखती हैं। वह चाहती हैं कि मुख्यमंत्री तक उनकी बात सुनी जाए ताकि भविष्य की योजनाओं पर विचार रख सकें।
बाल विवाह होने के बाद दिखाई हिम्मत, ससुराल जाने से किया मना
19 साल की देवपुरा गांव निवासी रेशमा बैरवा बताती हैं कि 13 साल की उम्र में उनकी बड़ी बहन के साथ ही उनके भी फेरे करवा दिए गए। रेशमा का कहना है कि खुद की शादी होने से तो वह रोक नहीं सकी, लेकिन उन्होंने ससुराल जाने से मना कर दिया। जैसे-तैसे वे परिवार को यह समझाने में कामयाब हो गई कि पहले 12वीं पास करना चाहती हैं। कुछ महीनों बाद 12वीं पास भी हो गई तो घरवाले ससुराल जाने का दबाव बनाने लगे। इसी दौरान 1 साल पहले वह समिति से जुड़ गई। समिति के विभिन्न समूहों से जुड़ी लड़कियां उनके घर जाकर परिवार को बाल विवाह के दुष्परिणामों के बारे में समझाने लगीं। आखिर में जीत उनकी हुई और वर्तमान में रेशमा बीएसटीसी की तैयारी कर रही हैं।
परिवार वाले बोले कि, हमसे ज्यादा समझते हो क्या, सही और गलत क्या है ?
देवपुरा गांव की ममता बैरवा भी बाल विवाह के विरोध में आवाज उठाने में शामिल रही है। 12वीं में पढ़ रही ममता बताती हैं कि 16 साल में उनके शादी की बात चली तो साथी लड़कियों को बताया। लड़कियां समझाने के लिए घर पहुंची तो परिवार वाले उन्हें फटकारते हुए बोले कि, हमसे ज्यादा समझते हो क्या, सही और गलत क्या है? इस पर योजनाबद्ध रूप से रोजाना समूह की लड़कियों ने समझाइश का दौर चलाया और उनका भी बाल विवाह होने से बच गया। अब ममता को हर वक्त चिन्ता सताती है कि आगे उसकी पढ़ाई जारी रहेगी या नहीं? गरीबी के चलते पिता को कैंसर की बीमारी का समय पर इलाज नहीं मिल सका और उनकी मौत हो गई। मम्मी खेत पर मजदूरी करके परिवार का लालन-पालन करती है। ऐसे में परिवार को सरकारी मदद का इंतजार है ताकि वह आगे भी पढ़ सके।
कॉलेज जाने में आ रही दिक्कत, गाड़ी में बिठाने से पहले पूछते हैं जाति
देवपुरा की कोमल बैरवा और बगड़ी गांव की निशा हरिजन भी ऐसी ही लड़कियां हैं जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दसवीं में 84 प्रतिशत अंक लाने वाली 12वीं में पढ़ रही कोमल अपने गांव में सरकारी योजनाओं के बारे में लड़कियों को जागरूक करने के साथ उन्हें इनका लाभ भी दिलवा रही हैं। दूसरी ओर 12वीं में 60 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाली 19 साल की निशा हरिजन जातिवाद का दंश झेल रही हैं।
निशा ने बताया 12 वीं में पढ़ाई करते समय स्कूल जाने वाले रास्ते पर शराब की दुकान थी, जिसके चलते नशा करने के लिए आने वाले लड़कों के भद्दे कमेंट का सामना रोजाना करना पड़ता था। इसके बाद पंचायत और अन्य लोगों के सहयोग से दुकान को स्कूल जाने वाले रास्ते से हटवाया। उनका कहना है कि शराब दुकान तो हट गई, लेकिन अब बगड़ी से निवाई कॉलेज जाने के लिए गांव से सार्वजनिक परिवहन का साधन नहीं मिल पाता है। निशा ने बताया कि निजी वाहन चालक कॉलेज ले जाने से पहले सवाल करते हैं- कौनसी जाति से हो? जैसे ही वो पूरा नाम बोलती हैं, गाड़ीवाला निकल जाता है। जिसके कारण काफी देर तक उन्हें कालेज पहुंचने के लिए गाड़ी भी नहीं मिल पाती है और काफी देर तक इंतजार भी करना पड़ता है।