


अलवर जिला वैश्य महासम्मेलन समिति की जारी अपील ने अलवर की राजनीति में हलचल मचा दी है। चुनाव आते हैं, चले जाते हैं। इस बार बार भी ये ही होगा इसलिए धैर्य जरूरी है, आपसी द्वेष से दूर रहें, इस बार एक ऐसा समाज वैश्य समाज चुनाव में जातिवाद को बहुत बढ़ावा देते दिख रहा है जो 1952 से अब तक अलवर में जातिवादी कभी नहीं रहा।
हमेशा ये समाज दूसरी जाति को साथ लेकर चला, इनको हमेशा भाजपाई माना जाता रहा, कभी भाजपा से गद्दारी नहीं की, भाजपा जीत मतलब वैश्य रहा, इस बार भी खूब राजनीति में भाग लो, किसी को भी वोट दो, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अलवर में गंगा जमुनी संस्कृति वाला वैश्य समाज एक विधायक जैसे छोटे से पद के लिए अपने बुजुर्गो की बनाई पहचान खो रहा है।
किसी समाज की मीटिंग नहीं हो रही पर कभी अग्रवाल समाज, कभी महावर समाज,कभी खण्डेलवाल समाज की मीटिंग चुनाव को लेकर हो रही है, क्या ये समाज का राजनीतिकरन नहीं। क्या इससे पहले कभी चुनाव में मीटिंग हुई, इतना हल्ला हुआ, इस बार ये सभ्य वैश्य समाज लांग से बाहर क्यों है? ब्रह्मण समाज ने कोई मीटिंग नहीं की। वोट देना है वहां दो लेकिन वैश्य समाज से ये उम्मीद कतई नहीं की वो अलवर शहर जैसे गंगा जमुनी संस्कृति के शहर में जातीवाद फैला कर भविष्य की खाई गहरी कर दे। अ
लवर जिला वैश्य महासम्मेलन समिति ने तो एक पार्टी के खिलाफ फतवा जारी कर दिया, वो पार्टी जिसने लोकसभा अध्यक्ष वैश्य, देश का गृह मंत्री जैसे कई बड़े पद वैश्य को दे रखे हैं और राजस्थान के भावी CM में वैश्य का नाम है फिर भी करीब 70 साल से एक पार्टी से जुडा अलवर का वैश्य समाज एक विधायक पद को प्रधानमन्त्री पद मान चुका और जातिवादी हो गया, अलवर में और भी समाज है, पंजाबी समाज, एस सी, एसटी, ब्राह्मण, कलाल, सैन, धोबी,सुनार, राजपूत, सैनी आदि ने टिकट के बाद किसी ने जातिवाद की मीटिंग नहीं की जो वैश्य समाज बार बार कर रहा है जबकि वैश्य समाज अलवर शहर की शान है, हमेशा एक पार्टी के साथ रहा, जैसे धर्म नहीं बदला वैसे पार्टी नहीं बदली, आज छोटे से विधायक पद ने इस धीमधारी समाज की छवि पर हमला किया, अगर ये समाज बीजेपी से हटा तो पीढ़ी ये उदाहरण जरूर देंगी की 70 साल बाद वैश्य समाज ने एक तुच्छ विधायक पद के खातिर बुजुर्गों की परंपरा तोड़ दी, अगर ये समाज नहीं डिगा तो देश में गूंज होगी की अलवर का वैश्य जातिवादी नहीं,36 बिरादरी का संरक्षक है।
पहला लक्ष्य अलवर में भाइचारा हो, नेता आयेंगे जायेंगे चुनाव होते रहेंगे, अभी टिकट नहीं मिला तो आगे सही, वोट कही दे दो पर मीटिग मीटिंग खेल कर क्यों अलवर का जातिगत माहौल बिगाड़ते हो जो माहौल आपके पूर्वजों ने बनाया। सबसे पहले भाईचारा, उसके बाद दूसरा नारा । गलती माफ हमारा अलवर हमे बचाना है, चुनाव तो आना जाना है।