


"इन्सुलिन प्लांट" का वानस्पतिक नाम है, केमीकोस्टस कस्पीडटेस (Chamaecostus cuspidatus) है, जो फेमिली कॉस्टेसी (Costaceae) की एक सदाबहार झाड़ी है। इसे स्पाइरल फ्लॅग, स्टेप लैड, क्रेप अदरक, कुए, केमुक, कुमुल, कीकंद, पकरमुला, जारूल, केऊकंद और पुष्करमूला आदि नामों से भी जाना जाता है।
पौधे का विवरण: इन्सुलिन प्लांट अदरक से मिलती जुलती प्रजाति है। एक बहुवर्षीय पौधा है, जिसमें लाल रंग के फूल लगते है। पत्ते लंबे, चौडे व गूदेदार होते हैं। इन्हें सुखाकर पाउडर के रूप में लेने से ब्लड शुगर को नियंत्रित होता है।
कैसे लगायें: केमिकोस्टस के पौधे 2-3 फीट ऊँचाई के होते है, जिन्हें आसानी से गमलों में उगाया जा सकता है। वर्षा ऋतु में इनके राइजोम्स को रोपना चाहिये। लगाने के बाद ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं।
उपयोगिता : इन पौधों में कोई इंसुलिन नही पाई जाती है, और ना ही ये शरीर में इसे पैदा करते हैं। लेकिन पौधे में मौजूद केमिकल्स शरीर मे शुगर को आसानी से ग्लाइकोजन में बदल देते हैं, जिससे शर्करा का मेटाबोलिज्म आसान हो जाता हैं।
सरकार द्वारा बढ़ावा: हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर स्थित बॉटनीकल गार्डन द्वारा इन्सुलीन प्लांट को किसानों के बीच प्रमोट किया जा रहा है। उन्हें गार्डन की नर्सरी से पौधे उपलब्ध करवाए जा रहे हैं, जिसे वे अपने घरों पर गमले में लगा रहे हैं। इसकी एक पत्ती चबाकर चूसने से मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को काफी फायदा पहुंचता है।
प्रकृति का वरदान : इंसुलिन का पौधा प्रकृति की ओर से मधुमेह के रोगियों को एक अनमोल उपहार है। इसकी पत्तियों में कोरोलोसिक एसिड होता है। प्रतिदिन इसकी एक-दो पत्ती खाकर मधुमेह को नियंत्रण में रखा जा सकता है। इसमें बहुत से फायटोकेमिकल्स (फ्लैवोनॉइड, स्टेरॉयड, अल्कलॉइड, प्रोटीन्स, सैपोनिन्स आदि) पाए जाते हैं, जो मधुमेह के अलावा खांसी, जुकाम, नाक, पेट के कीड़े, त्वचा संक्रमण, आंखों का संक्रमण, दमा, गठिया, फेफड़ों, फफूंदी जनित, यकृत की बीमारियों, शरीर शुद्धीकरण, जिगर की सूजन, गर्भाशय के संकुचन, कब्ज, दस्त आदि के इलाज में भी कारगर होते हैं।
डॉ. पीयूष त्रिवेदी, आयुर्वेद चिकित्सा प्रभारी राजस्थान विधान सभा जयपुर।
9828011871.