Saturday, 29 August 2026

पं.दीनदयाल स्मृति व्याख्यान: एक साथ रहने वाले मानव आपस में सहयोग करें यह रामराज्य: डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी


पं.दीनदयाल स्मृति व्याख्यान: एक साथ रहने वाले मानव आपस में सहयोग करें यह रामराज्य:  डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

देश के विख्यात निर्माता, निर्देशक एवं अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि राम राज्य का मतलब, कोई किसी का शत्रु नहीं रहने वाले सभी मानव एक दूसरे का सहयोग करना ही राम राज्य है। उन्होंने कहा कि इस देश को गर्व होना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस परंपरा को पुर्नजीवित किया जो हजारो सालो से चली आ रहीं थी।

एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान की ओर गुरुवार को बिड़ला सभागार में धर्म दंड धर्म राज्य एवं संवैधानिकता पर हुए व्याख्यान में द्विवेदी  ने कहा कि देश में हर दिन उठने वाले प्रश्नों के उत्तर को लेकर देशवासी कई माध्यमों से लिखने का प्रयास करते है।  लेकिन उन में से बहुत ही कम लोग अर्थात  न के बराबर लोग  मूल ग्रंथो तक कोई नहीं जाता है। देश के विद्वान्  इसको लेकर प्रयास नहीं करते है।  उन्होंने बताया कि पिछले दिनों सनातन धर्म को लेकर देश में एक बहस छिड़ी लेकिन धर्म की व्याख्या सही तरीके से नहीं की जाती है क्योंकि धर्म का स्वरूप बहुत ही व्यापक हैं। 


डॉ. द्विवेदी कहा कि दो ही व्यक्ति होते है एक धार्मिक और एक अधार्मिक। उन्होंने कहा कि धर्म के अपमान के कारणों को जानने के लिए ग्रंथो  तक पहुंच रहा हूँ। उन्होंने कहा कि धर्म पर व्याख्यान  देना मेरे लिए चुनौती थी जिसे  मेने स्वीकार किया।  उन्होंने कहा कि दंड धर्म में प्रतिक है। दंड केवल पुरोहित ही नहीं करता हैं। इसको धारणा करने का प्रथम अधिकार विद्याध्यन करने वाले व ब्रमचर्य का पालना करने वाले स्टूडेंस्ट का  हैं। उसके बाद पुरोहित का है। तीसरा सन्यासी का हैं। 

उन्होंने कहा कि धर्म राज्य और राम राज्य में  कोई अंतर हैं?  उन्होंने कहा कि हम राम राज्य, धर्म राज्य की कल्पना करते है लेकिन कृष्ण राज्य की कल्पना नहीं करते हैं।  उन्होंने  कहा कि कृष्ण कभी राजा नहीं बने। अंत तक  द्वारका  पर शासन उग्रसेन ने ही किया था। उन्होंने  कहा कि राम राज्य से लेकर अब तक भरत जैसा लोकप्रतिनिधि पैदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि राम के अनुसार पिता की आज्ञा ही सर्वोपरि है।  वो ही धर्म है।  उन्होंने पिता की आज्ञा को ही धर्म मानते हुए वनवास स्वीकार किया। उन्होंने  कहा  कि वर्तमान पीढ़ी को  रामायण का अयोध्या कांड जरूर देखना पढ़ना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि धर्मदण्ड की शासन का आधार होता है। भारत में धर्मदण्ड की व्यवस्था आदिकाल से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि धर्म राज्य का निकटतम अंग्रेजी शब्द रुल आॅफ लॉ है। शर्मा ने कहा कि धर्म की व्याख्या करने वाली अब तक कोई अंतिम पुस्तक नहीं है। धर्म क्या है यह बहस जारी है। धर्म वहीं होता है जिसे आप जानकार आचार—व्यवहार में उतारतें है।

इस अवसर पर डॉ० महेश चन्द्र शर्मा का उनके 75 वें जन्मदिन पर नागरिक अभिनन्दन भी किया गया। ,श्री पुष्कर उपाध्याय.कमलेश विद्यार्थी, डॉ० एसअग्रवाल, सुनील कोठारी, नवरत्न राजोरिया,सूरज सोनी, देवेश बंसल,अमिताभ हीरावत, प्रदीप शेखावत,नर्बदा इंदोरिया,प्रदीप सिखवाल,जुगल अग्रवाल सहित प्रतिष्ठान के पदाधिकारियों ने शाल ओढ़ाकर डॉ० शर्मा, श्रीमती सुमिता शर्मा, एडवोकेट हेमेन्द्र शर्मा का सम्मान कर स्मृति चिन्ह भेंट किया।

इस कार्यक्रम के संयोजक डॉ० एस एस अग्रवाल ने पधारे सभी गणमान्य अतिथियों व आयोजन मे शामिल लोगों का आभार व्यक्त किया, बिडला सभागार में आयोजित व्याख्यान मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख मा स्वांतरंजन जी, क्षेत्रीय संघचालक डा रमेश जी अग्रवाल, क्षेत्रीय प्रौढ़ प्रमुख मा कैलाश चंद्र जी, मा रामप्रसाद जी संयोजक धर्म जागरण क्षेत्रीय बौद्धिक प्रमुख मा श्रीकांत जी, राजस्थान सेवा भारती के संगठन महामंत्री मा मूलचंद जी, पाथेय कण के प्रबंध संपादक माणक चंद जी, जयपुर प्रांत प्रचारक मा बाबूलाल जी, 

जयपुर प्रांत कार्यवाहक मा गेंदालाल जी, जयपुर संपर्क प्रमुख डा हेमंत जी सेठिया, डा मुरलीधर जी कुटुंब प्रबोधन, डा लोकेश जी शेखावत पूर्व कुलपति जय ना व्यास विश्व विद्यालय, अल्पना जी कोटेचा कुलपति राज विश्व विद्यालय, समाजसेवी रवि नैयर, बसवराज जी स्वाभिमान आंदोलन, सरदार जसबीर सिहं, हिदायत खां धोलिया, प्रो० शीला राय, आदि प्रबुद्ध जनो ने कार्यक्रम में शिरकत की।


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